मनुष्यों की सामान्य प्रवृति है कि वह अपने भीतर सिर्फ गुण देखता है और दूसरों के गुणों को पहचान नहीं पाता है। यही कारण है कि मनुष्य खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानने की भूल कर बैठता है। जबकि गौर से देखें तो जिसे आप अयोग्य व्यक्ति मानते हैं उसमें भी कुछ न कुछ गुण अवश्य पाएंगे।
अगर उन गुणों को अपने अंदर ग्रहण करने की कोशिश करें तो जिस व्यक्ति को अयोग्य मान रहे थे वह भी आपको गुणों का खजाना नज़र आने लगेगा। इससे आप कई चीजें एक साथ प्राप्त कर लेंगे। एक तो उस व्यक्ति की नज़र में आपका सम्मान बढ़ेगा। मन से निरादर की भावना दूर होगी और आपसी प्रेम में वृद्धि होगी।
महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी एक ऐसी ही घटना का जिक्र यहां प्रस्तुत है जो बताता है कि किस प्रकार हमें बुराईयों में से अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। महात्मा गांधी इंग्लैंड की यात्रा पर थे। उस समय उन्हें एक अंग्रेज ने एक कागज पर बुरा-भला लिखकर दिया। गांधी जी ने उस व्यक्ति से कुछ नहीं कहा बल्कि कागज में लगा हुआ पिन निकालकर अपने पास रख लिया और कागज फेंक दिया।
गांधी जी के साथ जो लोग थे उन्होंने गांधी जी से कहा कि अंग्रेज आपको बुरा-भला कह रहा है और आप उसे कुछ जवाब नहीं दे रहे हैं। गांधी जी ने कहा कि कागज पर लिखे हुए शब्द मेरे लिए उपयोगी नहीं थे। इसलिए मैंने उन्हें फेंक दिया। जबकि कागज में लगा हुआ पिन उपयोगी है इसलिए मैंने उसे अपने पास रख लिया है। गांधी जी ने ऐसा कह कर यह संदेश दिया कि बुराईयों को छोड़ दो और जहां कहीं कुछ भी अच्छाई दिखे उसे तुरंत ग्रहण कर लो।