बचपन में यानी उन्नीसवीं शताब्दी के शुरु तक विज्ञान कहता था कि मनुष्य या
जीव आखिर है जड़ तत्वों के, अमुक अमुक रसायनों के एक विशेष संयोग सम्मिश्रण
ही तो है। अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी एक चलता-फिरता पेड़ है।
रासायनिक संयोग उसे जन्म देते, बढ़ाते और बिगाड़ देते हैं।
ग्रामोफोन के
रिकार्डरों पर सूई का संयोग होने से आवाज निकलती है और वह संयोग-वियोग में
बदलते ही ध्वनि प्रवाह बन्द हो जाता है। जीव अमुक रसायनों के अमुक मात्रा
में मिलने से उत्पन्न होता है। अणु अमर हो सकता हैं, पर शरीर नहीं, उसकी
विशेष स्थिति चेतना भी मरण धर्मा है।
प्रसिद्ध विज्ञान लेखक नील एंडर्सन ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक
‘डिफरेंसंस विद रिलीजन’ में लिखा है कि विज्ञान की यह धारणा अब बदल गई है।
शुरु दिनों में जीवाणु की शरीर और मन का आधार था। बाद में महसूस किया गया
कि चेतना की अपनी सत्ता है वह अपने अनुकूल जीवाणुओं पर सवारी गांठती है। अब
विज्ञान आगे बढ़ रहा है और उसकी प्रौढ़ता समीप आई है।
शक्ति की दो धाराएं मानी जाती रही हैं उसी परम्परा के अनुसार एक को भौतिक
और दूसरे का प्राणिज माना गया है। दोनों आपस में पूरी तरह गूंथी हैं इसलिए
जड़ में चेतना का और चेतन में जड़ का आभास होता है। वे दोनों ज्वार-भाटे की तरह लहरों के निचाई -ऊँचाई का अन्तर दिखने की तरह
हैं।
यद्यपि उन दोनों की व्याख्या अलग-अलग रूपों में भी की जा सकती हैं और
उनके गुण, धर्म पृथक बताये जा सकते हैं। मस्तिष्कीय विद्या के, मनोविज्ञान के आचार्य- न्यूरोलॉजी, मैटाफिजिक्स,
साइकोलॉजी आदि के सन्दर्भ में मस्तिष्कीय कोशों और केन्द्रों की दिलचस्प
चर्चा करते हैं।
उनकी दृष्टि में वे कोश ही अपने आप में पूर्ण हैं। यदि यही
ठीक होता तो मृत्यु के उपरान्त भी उन कोशों की क्षमता उसी रूप में या अन्य
किसी रूप में बनी रहनी चाहिए थी। पर वैसा होता नहीं ।