भोजन में आपकी रूचि है तो हो
सकता है कि आप इस बात से दुःखी हों लेकिन परेशान नहीं हों आप जो चाहें भोजन करें।
लेकिन यह याद रखें कि जीभ के वश में नहीं होना है। जब अच्छा भोजन मिले तो उसे भी
प्रसाद मानकर स्वीकार कर लें और कभी कहीं आपकी रूचि का भोजन न मिले तो इसे भी
प्रसाद मानकर ही स्वीकार करें। समझें आज प्रभु की यही इच्छा है। लेकिन इसका
तात्पर्य यह नहीं कि आप बासी और सेहत को नुकसान पहुंचाने वाला भोजन करें। ऐसे भोजन
को तो गीता में भी अच्छा नहीं कहा गया है।
भोजन पसंद नहीं आने पर थाली फेंक
देना, खाना बनाने वाले को बुरा भला कहना यह खाने का अपमान है साथ ही यह प्रभु के
प्रसाद का भी अपमान है। अगर आप इस प्रकार की हरकत करते हैं तो भोजन बनाने वाले के
मन को भी आहत पहुंचाते हैं इस तरह जाने-अनजाने एक साथ कई पाप अर्जित कर लेते हैं।
इसलिए ऐसी आदत आपमें है तो उसे आज ही छोड़ने की कोशिश करें।
डॉ. हरिवंशराय
बच्चन के नाना का नाम था मुंशी ईश्वरी प्रसाद। मुंशी जी इलाहाबाद न्यायालय में
कार्य करते थे। न्यायालय के काम से इन्हें जब भी बाहर कहीं जाना होता था तो अपने
साथ भोजन बनाने के लिए माताभीख को साथ ले जाते थे। एक बार की बात है मुंशी ईश्वरी
प्रसाद कहीं बाहर गये तो साथ में माताभीख भी ले गये।
माता भीख ने पूरी और
लौकी की सब्जी बनायी और मुंशी जी के सामने परोस कर रख दिया। मुंशी जी ने भगवान को
भोग लगाकर भोजन ग्रहण कर लिया। जब माताभीख ने स्वयं भोजन किया तो उसे लौकी की सब्जी
कड़वी लगी। उसने मुंह में रखा कौर बाहर फेंक दिया और दौड़कर मुंशी जी के पास गया और
कहने लगा कि 'हुजूर माफ कीजिए, सब्जी कड़वी थी फिर भी आपने खा ली।'
मुंशी
जी ने माताभीख से कहा कि 'लौकी अंदर से कड़वी थी वह तुम्हें कैसे पता चलता। इसलिए
तुम्हारी कोई गलती नहीं है।' मैंने सब्जी का भोग भगवान को लगा दिया था और जब भगवान
ने उसे ग्रहण कर लिया तो प्रसाद का त्याग कैसे कर सकता था।
स्वाद के त्याग
के एक अन्य अर्थ यह है कि जब तब आप खाने की सोच में न रहें। जिस समय आप जो कम कर
रहे हैं उसी पर मन लगाइये। भोजन का विचार करेंगे तो काम बिगड़ सकता है। इस संदर्भ
में एक कथा है, एक साधु थे, एक दिन किसी ने उन्हें मालपुआ भेंट किया। साधु उस समय
पूजा कर रहे थे अतः अपने शिष्य को मालपुआ कुटिया में रख देने के लिए कहा। साधु का
मन पूजा में नहीं लग रहा था, मालपुए की खुश्बू उन्हें बार-बार अपनी ओर आकर्षित कर
रहा था।
साधु ने अपने मन को समझाने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन मन फिर भी
उन्हें मालपुए की ओर ले जा रहा था। साधु पूजा छोड़कर उठे और मालपुए को कुटिया से
बाहर फेंक दिया। इसके बाद ध्यान लगाकर पूजा संपन्न किया। शिष्यों ने पूछा कि आपने
मालपुआ क्यों फेंक दिया तो साधु ने समझाया जो आपको अपने लक्ष्य से भटकाए उसका त्याग
करना ही उचित है।