आर्यन के पिता की कहानी, जिसने आर्यन को ऐसा संदेश दिया, जिससे वह जीवन में ऊंचा उठ पाया।
आर्यन ऑफिस के कर्मचारियों से कह रहा था, आज मैं आपको अपनी जिंदगी का एक अनुभव सुनाता हूं। मेरा बचपन बहुत साधारण रहा। मां दूसरों के घरों में साफ-सफाई करती थीं और पिता दिहाड़ी मजदूर थे। हालांकि मेरी पढ़ाई में उन्होंने कभी कोई कमी नहीं आने दी, लेकिन रात के खाने में अक्सर हम लोग रोटी सेंककर नमक के साथ खाते थे।
कभी-कभी रोटी के साथ मक्खन या जैम भी मिल जाया करता था। सब आर्यन की बात सुनकर हंसने लगे। आर्यन आगे बोला, एक दिन रोटी सेंकते वक्त जल गई थी। मैं बैठा देख रहा था कि अब कौन इसे खाता है, क्योंकि रोटी काली हो गई थी और उसे देखकर ही खाने का मन नहीं हो रहा था। लेकिन पिता जी पर इसका कोई नहीं पड़ा। उन्होंने रोटी उठाई, उस पर थोड़ा-सा जैम लगाया और मजे से स्वाद लेकर खाने लगे। मां ने यह देखकर कहा, यह थोड़ी जल गई है।
पिता जी बोले, मुझे जली हुई रोटी पसंद है। स्वाद है इसमें। जब मां वहां से चली गईं, तो मैंने पिता जी से पूछा, क्या आपको सच में जली हुई रोटी अच्छी लगती है? इस पर पिता जी बोले, तुम्हारी मां दिन भर बहुत मेहनत करती है। आज वह बहुत थकी हुई भी लग रही है। और फिर एक दिन जली हुई रोटी खा लेने से मैं छोटा तो नहीं हो जाऊंगा। लेकिन तुम्हारी मां शांति से सो पाएंगी। फिर वह कहने लगे कि हममें से हर किसी में कुछ न कुछ कमी होती है।
सभी गलती करते हैं। लेकिन हम उन गलतियों को उभारने के बजाय सुधारने का काम करें, एक दूसरे की ताकत बनें, तो एक बेहतर कल का निर्माण कर सकते हैं। पिता जी की वह बात मेरे जेहन में बैठ गई और मैं आज तक उसे अपने जीवन में आजमाता हूं। उस गरीबी से निकलकर आज मैं इस कंपनी का सीईओ हूं, तो इसलिए कि मैं अपने साथ के लोगों की गलतियां नहीं निकालता, बल्कि उनके हुनर को तराशने और प्रोत्साहित करने के मौके ढूंढता हूं। इसीलिए मेरी कंपनी आज देश की सफलतम कंपनियों में से है।
सीख- दूसरों की कमियां न निकालना बड़प्पन की निशानी है।