मेघनाद के मारे जाने के बाद रावण ने कुंभकर्ण को युद्घ में भेजने के लिए सोचने लगा। लेकिन समस्या यह थी कि कुंभकर्ण को नींद से कैसे जगाया जाए क्योंकि कुंभकर्ण छह महीने तक सोया रहता था। छह महीने बाद एक दिन जगता और भोजन करके फिर सो जाता क्योंकि इसने ब्रह्मा जी से निद्रासन का वरदान मांग लिया था।
लेकिन किसी तरह कुंभकर्ण को जगाया गया। कुंभकर्ण ने रावण को सलाह दी कि राम से संधि कर लेने में भलाई है। लेकिन जब रावण नहीं माना तो कुंभकर्ण ने युद्घ में जाना स्वीकार कर लिया। इसने अपने विशाल शरीर से वानरों पर प्रहार करना शुरु कर दिया इससे राम की सेना में हहाकार मचा गया।
सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए राम ने कुंभकर्ण को युद्घ के लिए ललकारा और भगवान राम के हाथों कुंभकर्ण वीरगति को प्राप्त हुआ। कुंभकर्ण को अगर रावण्ा नींद से नहीं जगाता या इसकी बात मान लेता तो न रावण मारा जाता और न कुंभकर्ण। लेकिन वही बात है कि 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा'।