लक्ष्मण के जाने के बाद रावण साधु के वेष में भिक्षा मांगने आता है। सीता सीमा रेखा में रहकर भिक्षा देने का प्रयास करती है लेकिन रावण सीमा रेखा से निकलकर भिक्षा देने का आग्रह करता है।
साधु के रुप में रावण को सीता पहचान नहीं पाती है और सीमा रेखा पार कर जाती है। मौके की ताक में बैठा रावण सीता को पकड़कर अपने पुष्पक विमान में बैठाकर लंका लेकर विदा हो जाता है।
रामायण में सीता का सीमा रेखा पार करना संसार के लिए एक उदाहरण है कि मर्यादा की रेखा का किसी भी हाल में उल्लंघन नहीं करना चाहिए। साधु के रूप में शैतान भी हो सकता है इसलिए साधु के पास भी रहें तो मर्यादा रेखा का ध्यान रखें।
वर्तमान समय में यह बात काफी प्रासंगिक भी है क्योंकि बहुत से शैतान इन दिनों साधु का मुखौटा लगाए फिर रहे हैं, इसलिए सावधान रहने की बहुत जरूरत है।
राम और लक्ष्मण जब वापस कुटिया में आते हैं तब सीता को कुटी में नहीं पाकर किसी अनहोनी से आशंकित हो जाते हैं। सीता की तलाश करते हुए एक स्थान पर राम को सीता के कुछ आभूषण मिले। राम ने उन आभूषणों में से कर्णफूल को दिखाकर लक्ष्मण से पूछा कि यह तो सीता के कर्णफूल हैं लेकिन यह घने वन में कैसे आए।
इस पर लक्ष्मण ने कहा कि हे भाईया राम कर्णफूल भाभी के ही हैं यह मैं कैसे बता सकता हूं, मैंने तो कभी भाभी के मुख की ओर देखा ही नहीं। मैं तो सेवक और पुत्र भाव से सदा भाभी के चरणों को देखा है इसलिए मैं सिर्फ उनकी पायल को पहचानता हूं।
लक्ष्मण की इन बातों को सुनकर राम सीता के न होने के कारण दुःखी थे वहीं लक्ष्मण के प्रति अपार प्रेम और आदर भाव से आनंदित हो गए।