किलक के दादा जी बहुत बुजुर्ग हो चुके थे और सेना से सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनकी पेंशन कुछ सरकारी अधिकारी अवैध तौर से खा जाया करते थे। एक दिन किलक अपने दादा जी के साथ उनकी पेंशन लेने के लिए सरकारी विभाग में पहुंची, तो कुछ भ्रष्ट लोगों ने पहले तो उन्हें खूब घुमाया, फिर बहाने से दफ्तर के बाहर कर दिया। दादा जी ने तय कर लिया कि अब वह इसके खिलाफ लड़ेंगे। वह दफ्तर के सामने धरना देने बैठ गए। कई लोग किलक और उसके दादा जी को समझाने आए और बोले, यह सब करने से कुछ नहीं होगा सर। ये लोग बहुत ढीठ और दुष्ट हैं। आपके धरना देने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। यह सब सुन किलक बोली, दादा जी, ये लोग सही कह रहे हैं। हम इनसे नहीं लड़ सकते। हमारे पास कोई ताकत नहीं है इनसे लड़ने की। दादा जी मुस्कुराते हुए बोले, बेटा, एक समुद्र के किनारे बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं। समुद्र की एक लहर चट्टानों की तरफ बढ़ रही थी। उसने देखा, वहीं पास में एक और लहर थी, जो रो रही थी। पहली लहर ने दूसरी लहर से पूछा, तुम क्यों रो रही हो? दूसरी लहर बोली, सामने की चट्टानों से टकरा कर हम पानी में मिल जाएंगे। पहली लहर हंसने लगी। पूछों क्यों? दादा जी बोले, पहली लहर बोली, तुम अगर खुद को एक लहर भर समझोगी, तो यह डर जरूर रहेगा। लेकिन जब यह सोचोगी कि मैं उस विशाल समुद्र का हिस्सा हूं, जिसने इस जैसी लाखों चट्टानों को चकनाचूर किया है, तो डर खत्म हो जाएगा। दादा जी कहानी सुना ही रहे थे कि तभी वहां सेना के एक बड़े अफसर आ पहुंचे। उन्होंने किलक के दादा जी को देखते ही पहचान लिया और उनसे उनकी तकलीफ पूछी। बस, फिर क्या था, उन भ्रष्ट अफसरों की शामत तो आई ही, उन सारे बुजुर्गों को घर-घर जाकर पेंशन बांटी गई, जिनकी पेंशन महीनों से रुकी थी।