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सुख और दुःख सब विचारों का खेल हैः आशाराम बापू

Sat, 02 Feb 2013 11:04 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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भगवान श्रीरामचन्द्रजी अरण्य में विश्राम कर रहे थे और लखन भैया तीर-कमान लेकर पहरेदारी कर रहे थे। निषादराज ने श्रीरामजी की यह स्थिति देखकर कैकेयी को कोसना शुरू किया: ‘‘यह कैकेयी, इसे जरा भी खयाल नहीं आया! सुख के दिवस थे प्रभुजी के और धरती पर शयन कर रहे हैं! राजाधिराज महाराज दशरथनंदन राजदरबार में बैठते। पूर्ण यौवन, पूर्ण सौंदर्य, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम, पूर्ण प्रकाश, पूर्ण जीवन के धनी श्रीरामजी को धकेल दिया जंगल में, कैकेयी की कैसी कुमति हो गयी!’’
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लखन भैया के सामने कैकेयी को उसने कोसा। निषादराज ने सोचा कि ‘लक्ष्मणजी मेरी व्यथा को समझेंगे और वे भी कैकेयी को कोसेंगे’ लेकिन लखन लाला ऐन्द्रिक जीवन में बहनेवाले पाशवी जीवन से ऊँचे थे। वे मानवीय जीवन के सुख-दुःखों के थपेड़ों से भी कुछ ऊँचे उठे हुए थे। उन्होंने कहा : ‘‘तुम कैकेयी मैया को क्यों कोसते हो?
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
कोई किसी को सुख-दुःख देनेवाला नहीं है।’’
निषादराज कहता है: ‘‘क्या श्रीरामचन्द्रजी अपना कोई प्रारब्ध, अपने किसी पाप का फल भोग रहे हैं? आपका क्या कहना है?’’ लक्ष्मणजी कहते हैं: ‘‘श्रीरामजी दुःख नहीं भोग रहे हैं, दुःखी तो आप हो रहे हैं। श्रीरामजी तो जानते हैं कि यह नियति है, यह लीला है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण ये सब खिलवाड़ हैं, मैं शाश्वत तत्त्व हूँ और रोम-रोम में रम रहा हूँ, अनंत ब्रह्माण्डों में रम रहा हूँ। यहां तो नरलीला करने के लिए यहाँ रामरूप से प्रकट हुआ हूँ। श्रीरामजी प्रारब्ध का फल नहीं भोग रहे हैं।
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श्रीरामजी तो गुणातीत हैं, देशातीत हैं, कालातीत हैं और प्रारब्ध से भी अतीत हैं। महापुरुष प्रारब्ध का फल नहीं भोगते, वे प्रारब्ध को बाधित कर देते हैं। प्रारब्ध होता है शरीर का, मुझे क्या प्रारब्ध! यश-अपयश शरीर का होता है, बीमारी-तंदुरुस्ती शरीर को होती है, मेरा क्या! हम हैं अपने-आप, हर परिस्थिति को जाननेवाले उसके बाप! ऐसा तो सब ज्ञानवान जानते हैं फिर श्रीरामचन्द्रजी तो ज्ञानियों में शिरोमणि हैं। वे कहाँ दुःख भोग रहे हैं! दुःख तो निषादराज आप बना रहे हैं।’’

अब ध्यान देना, इस कथा से आप कौन-सा नजरिया लेंगे? कैकेयी कुटिल रही, स्वार्थी रही और अपने बेटे के पक्ष में वरदान लिया, यह अनुचित किया - ऐसा समझकर आप अगर अनुचित से बचना चाहते हैं तो इस पक्ष को स्वीकार करके अपने अंतःकरण को गलतियों से, कुटिलता से बचा लें तो अच्छी बात है। अगर, कैकेयी में प्रेम था और रामजी के दैवी कार्य में कैकेयी ने त्याग और बलिदान का परिचय दिया है, इतनी निंदा सुनने के बाद भी, लोग क्या-क्या बोलेंगे, यह समझने के बाद भी कैकेयी ने यह किया है ऐसा आप मानते हैं तो कैकेयी के इस त्याग, प्रेम को याद करके अंतःकरण में सद्भाव को स्वीकार करिये।

कैकेयी को कोसकर आप अपना दिल मत बिगाड़िये अथवा कैकेयी ने श्रीरामजी को वनवास दिया, अच्छा किया और हम भी ऐसा ही आचरण करें- ऐसा सोचकर अपने दिल में कुटिलता को मत लाइये। जिससे आपका दिल, दिलबर के ज्ञान से, दिलबर के प्रेम से, दिलबर की समता से, परम मधुरता से भरे, वही नजरिया आपके लिए ठीक रहेगा, सही रहेगा, बढ़िया रहेगा।

कोई भाभी, कोई देवरानी, कोई जेठानी, कोई सास या बहू अनुचित करती है तो आप यह अनुचित है ऐसा समझकर अपने जीवन में उस अनुचित को न आने दें, तब तक तो ठीक है लेकिन ‘यह अनुचित करती है, यह निगुरी ऐसी है, वैसी है...’ ऐसा कहके आप उन पर दोषारोपण करके अपने दिल को बिगाड़ने की गलती करते हैं तो आप पशुता में चले जायेंगे।

यदि सामनेवाली सास-बहू, देवरानी-जेठानी सहनशक्तिवाली है तो उसका सद्गुण लेकर आप समता लाइये। किसी में कोई सद्गुण है तो वह स्वीकारिये और किसी में दुर्गुण है तो उससे अपने को बचाइये। ऐसा करके आप अपने अंतःकरण का विकास कीजिये। न किसी का दोष देखिये और न किसी को दोषी मानकर आरोप करिये और न किसी की आदत के गुलाम बनिये।  

किसी का दोष देखकर आप मन में खटाई लायेंगे तो आपका अंतःकरण खराब होगा लेकिन दोष दिखने पर आप उन दोषों से बचेंगे और उसको भी निर्दोष बनाने हेतु सद्भावना करेंगे तो आप अपने अंतःकरण का निर्माण कर रहे हैं। संसार तो गुण-दोषों से भरा है, अच्छाई-बुराई से भरा है।

आप किसी की अच्छाई देखकर उत्साहित हो जाइये, आनंदित होइये और बुराई दिखने पर अपने को उन बुराइयों से बचाकर अपने अंतःकरण का निर्माण करिये और गहराई में देखिये कि यही अच्छाई-बुराई के ताने-बाने संसार को चलाते हैं। वास्तव में तत्त्वस्वरूप भगवान सच्चिदानंद हैं, मैं उन्हीं में शांत हो रहा हूँ। जहाँ-जहाँ मन जाय, उसे घुमा-फिराकर छल, छिद्र, कपट से रहित, गुण-दोष के आकर्षण से रहित अपने भगवत्स्वभाव में विश्रांति दिलाइये, विवेक जगाइये कि ‘मैं कौन हूँ ?’, अपने से ऐसा पूछकर शांत होते जाइये।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से  सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। 
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