जिसका हमें पता नहीं, वह ना के बराबर है। होगा या नहीं होगा, क्या फर्क पड़ता है? और जिसका हमें ज्ञान है, न भी है, तो भी वह हमारे जीवन को प्रभावित करेगा। एक स्वप्न को भी आप सत्य मान लें, तो आपका जीवन उससे प्रभावित हो जायगा। और आप इस सारे जीवन को भी स्वप्न मान लें, तो आप इससे अप्रभावित हो जाएंगे।
आपकी मान्यता में आपका अस्तित्व है, और जैसा आप मान लेते हैं, हो जाता है।
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यह जो भीतर किरण है, यह इतनी सूक्ष्म है कि जब तक स्थूल से हमारा ध्यान संपूर्ण रूप से न हटे, तब तक यह सुनायी न पडे़गी। इसे सुनने के कई उपाय हो सकते हैं; कई उपाय हैं। मेरी दृष्टि में जो उपाय सर्वाधिक उपयोगी हो सकता है, वह यह है कि पहले आप अपने आस-पास पूरा तूफान उठा लें। इसलिए ध्यान के जो प्रयोग मैं आपको करवा रहा हूं, वे सब तूफानी हैं।
पूरा तूफान उठा लें, जितना शारेगुल हो सकता हो, खड़ा कर लें। स्थूल की जितनी आवाजें हो सकती हैं, वे सब हो जाने दे। बाहर कुछ भी शांत न रह जाए, सभी कुछ उपद्रव हो जाए, विक्षिप्तता चारों तरफ खड़ी हो जाए, तब अचानक रुक जाएं कंट्रास्ट में, इस तूफान की पृष्ठभूमि में शायद क्षण भर को आपको शांति की किरण दिखाई पड़ जाए।
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विपरीत में देखना आसान होता है। लेकिन तब विपरीत को अति तक ले जाना जरूरी है। जो लोग विश्राम की कला के संबंध में खोज करते हैं, आर्ट आफ रिलेक्जेशन के संबंध मे, उन्होंने एक मौलिक सूत्र खोजा है, यह अति वैज्ञानिक है। अगर कोई आपसे कहे कि शरीर को शिथिल छोड़ दो, विश्राम में छोड़ दो, आप क्या करोगे? कैसे छोड़ दोगे? ऐसे लेट जाने का नाम विश्राम नहीं है।
विज्ञान एक बड़ी ही अनूठी अवस्था है, जिसका आपको पता ही नहीं। आप जागना जानते हैं, जो कि श्रम है; आप सोना जानते हैं, जो कि थकना है। विश्राम का आपको पता ही नहीं। जागना श्रम है, सोना थक जाना है। इसलिए मजदूर गहरा सो लेता है। इसलिए नहीं कि उसको गहरा विश्राम पता है; इसलिए कि वह गहरा थक जाता है।
अमीर नहीं सो पता; क्योंकि वह थक नहीं पाता। हमारी नींद थकान है, सिर्फ ध्यानी की नींद विश्राम होती है। हम जितने थक जाते हैं, उतनी नींद में गिर जाते हैं। शरीर जवाब दे देता है, वहां और श्रम नहीं किया जा सकता, शरीर गिर जाता है। थकान और श्रम के बीच में, मध्य में एक बिंदु है, जो विश्राम है।
लेकिन हम विश्राम में जाएं कैसे? हम दोनों में घूम सकते हैं- श्रम कर सकते हैं, थक सकते हैं। बीच में एक जगह है और उसका कैसे पता करें? कब विश्राम का क्षण है?
साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन