कोई बीस वर्ष तक मैं रायपुर में रहा था। जिस मकान में मैं रहता था, एक बूढ़ा आदमी उसी मकान के पड़ोस में रहता था। वह दांत का मंजन बेचने का काम करता था। जब मेरा उससे परिचय हो गया तो मैंने उससे पूछा, कि दांत तो तुम्हारे एक भी नहीं। तुमसे दांत का मंजन कौन खरीदता होगा?
तुम अपने दांत नहीं बचा सके और तुम तख्ती लगाकर बैठते हो बाजार में कि इस मंजन से दांत मजबूत हो जाते हैं, दांत गिरने से बच जाते हैं और तुम्हारे एक दांत नहीं है। कौन तुमसे मंजन खरीदता होगा? और किस हिम्मत से तुम मंजन बेच आते हो?
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उस बूढ़े ने थोड़ी नाराजगी से कहा, इससे क्या फर्क पड़ता है? कई लोग पुरुष होते हुए भी चोलियां बेचते हैं, साड़ियां बेचते हैं, चूडि़यां बेचते हैं। मैं उससे राजी हुआ, तो उसने इतनी बात और जोड़ी, और उसने कहा, कि फिर लोग अपने दांतों में उत्सुक हैं। मेरे दांत की तरह देखते कहां?
वस्तुतः उस बूढ़े आदमी ने कहा कि आप पहले व्यक्ति हैं जिसने मुझसे यह सवाल किया है और संदेह जताया है। लोग अपने दांतों की चिंता कर रहे हैं। दंत-मंजन का डब्बा देखते हैं। मेरे दांत की कौन फिक्र करता है?
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वस्तुतः संसार ऐसा ही है लोग अपनी चिंता करते हैं दूसरों की ओर देखते तक नहीं। यही कारण है कि अक्सर लोग धोखा खाते हैं और परेशान होते हैं। अगर दूसरों की ओर भी हम देखने लगे तो कभी चिंतित और परेशान नहीं होंगे।
ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली