सभ्यता दो रोग पैदा करवाती है, एक तरफ अहंकार और एक तरफ अपराध। तुमने किसी बच्चे को कहा, सिगरेट नहीं पीना; महापाप है, नरक में सड़ोगे। तुमने डरवाया। अब अगर पीएगा, तो अपराध-भाव पैदा होगा कि मैंने कुछ पाप किया। मां-बाप से झूठ बोला, छिपाया। वह डरा-डरा घर आएगा।
चैकन्ना रहेगा कि कहीं न कहीं से खबर मिलने ही वाली है। कोई न कोई देख ही लिया होगा। कपड़े में बास आ जाएगी मां को। मुंह को पास लाएगा, तो मुंह से पता चल जाएगा। वह पकड़ा ही जाने वाला है। वह अपराध से भरा हुआ है, डर रहा है, घबड़ा रहा है।
अगर यह भय बहुत गहरे बैठ जाए, तो तुम जीवन भर डरते ही डरते समाप्त हो जाते हो। तुम जी ही नहीं पाते। भयभीत जीएगा। कैसे! अपराध तुम्हारे जीवन को चूस डालता है। अगर सिगरेट न पी; पीने की आकांक्षा थी, पीने का मन था, हाथ में उठा ली थी, फिर छोड़ दी, त्याग कर दी, तो अकड़ पैदा होगी, अहंकार पैदा होगा।
यह लड़का घर और ही चाल से चलता हुआ आएगा, कि इसने कोई महाकार्य कर लिया है, कि जैसे यह परमात्मा की नजरों में बहुत ऊपर उठ गया। स्वर्ग बिलकुल निश्चित है!
सिगरेट पीने वाले क्या नर्क जाएंगे?
छोटे बच्चों को तो छोड़ दो, तुम्हारे बड़े साधु-संन्यासी भी ऐसी ही छोटी बातों में स्वर्ग और नरक का हिसाब लगा रहे हैं! किसी ने उपवास कर लिया; वह पक्का मानकर बैठा है कि स्वर्ग में बैंड-बाजे लिए परमात्मा खड़ा है। जैसे ही वह मरेगा कि बैंड-बाजे बजे, हाथ पर जुलूस निकला! बचकानी बुद्धि है। तुमने किया क्या है?
भोजन नहीं किया, कि सिगरेट नहीं पी, कि पान नहीं खाया। कुछ हैं कि जिन्होंने पान खा लिया है, सिगरेट पी ली है, वे घबड़ा रहे हैं कि नरक का द्वार खुला, अब खुला। अब देर नहीं है और शैतान ने दबोचा!
दोनों ही बातें नासमझी की हैं। और दोनों ही के पीछे कारण है। कारण है, समाज, राज्य, धर्म। समाज जीता है व्यक्ति को डराकर, भयभीत करके। पहले डराओ। जब आदमी बिलकुल घबड़ा जाए, तब उसको बचाने आ जाओ। यह जाल है।मैंने सुना है, एक गांव में दो भाई थे। उनका धंधा बहुत अच्छा चलता था।
एक भाई रात में जाकर लोगों की खिड़कियों पर डामर फेंक आता था। और दूसरा भाई सुबह से निकलता था चिल्लाता हुआ, किसी को कांच तो साफ नहीं करवाने हैं? धंधा बड़ा परिपूर्ण था। उसमें कभी ऐसा होता ही न था कि ग्राहक न मिलें। पहला भाई ग्राहक पैदा कर जाता था, दूसरा भाई सुबह जाकर लोगों के कांच पर डामर साफ कर आता था।
क्या अपराध से बचा लेंगे पंडित और पुरोहित
पहले पुरोहित तुम्हें डराता है। जब तुम भयभीत हो जाते हो, तब तुम्हें सांत्वना देता है कि घबड़ाओ मत। हमारे पास कुंजियां हैं, उपाय हैं, जिनसे तुमने अगर पाप भी किए हैं, तो भी क्षमा हो जाओगे।
जिनसे अगर तुमने अपराध भी किए हैं, तो अपराध तुम्हें नरक में न ले जाएंगे। हमारे पास मंत्र हैं, यज्ञ का साधन है। अगर तुमने हमारी सुनी और मानी, तो क्षमा कर दिए जाओगे। घबड़ाओ मत, बचाने का उपाय है। बचने की संभावना है।
मनुष्य को पहले हम रुग्ण करते हैं, फिर इलाज। पहले बीमार करते हैं, फिर चिकित्सा करते हैं। ऐसे धंधा चलता है।आदमी स्वस्थ है, कुछ करने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह जारी रहेगा, क्योंकि राजनेता व्यर्थ हो जाएगा, अगर तुम घबड़ाए न। अगर तुम डरे न, तो राजनेता तुम्हें युद्धों में न झोंक सकेगा। अगर तुम डरे न, तो मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे खाली हो जाएंगे। क्योंकि कौन वहां घुटने टेककर प्रार्थना करेगा?
अगर तुम डरे न, तो समाज की छाती पर जो लोग बैठे हैं, वे बैठे न रह सकेंगे। तब व्यक्ति मुक्त होने लगेगा। समाज बिखरने लगेगा। लोग सरल हो जाएंगे, लोग नैसर्गिक हो जाएंगे, लोग आनंद-भाव को उपलब्ध हो जाएंगे, लेकिन तब दुष्टों की, शोषकों की, पीडि़त करने वालों की, परपीड़कों की बड़ी कठिनाई हो जाएगी। वे क्या करेंगे?
ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली