असल में मृत्यु और जन्म दो घटनाएं नहीं हैं, एक ही घटना के दो छोर हैं। इसलिए एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। अगर सिक्के का एक पहलू हाथ में आ जाए, तो दूसरा पहलू अपने-आप हाथ में आ जाएगा।
ऐसा नहीं होता कि सिक्के का एक पहलू मेरे हाथ में हो, तो दूसरे को कैसे हाथ में लूं। वह दूसरा अपने-आप हाथ में आ जाता है। मृत्यु और जन्म एक ही घटना के दो छोर हैं। अगर होशपूर्ण हो जाए, तो जन्म अनिवार्य रूप से होशपूर्ण हो जाता है। मृत्यु यदि बेहोश हो, तो जन्म भी बेहोश होता है।
अगर कोई मरते क्षण में होश से भरा रहे, तो अपने नए जन्म के क्षण में भी पूरे होश से भरा रहता है। मरते क्षण में बेहोश हो, तो नए जन्म के क्षण में भी बेहोश होता है। हम सब बेहोश ही मरते हैं और बेहोश ही जन्मते हैं, इसलिए हमें पिछले जन्मों का कोई स्मरण नहीं रह जाता है।
लेकिन पिछले जन्मों की पूरी स्मृति हमारे मन के किसी कोने में सदा उपस्थित रहती है। और यदि हम चाहें, तो इस स्मृति को जगाया जा सकता है। दूसरी बात, जन्म के संबंध में सीधा कुछ भी नहीं किया जा सकता। जो कुछ भी किया जा सकता है, वह मृत्यु के संबंध में ही किया जा सकता है।