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स्त्री भाव से मिलिए जरुर मिल जाएंगे भगवान- ओशो

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भगवान हैं और इसी भाव से हर व्यक्ति मंदिर में जाता है और तीर्थयात्राएं करते हैं। लेकिन कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मंदिर या तीर्थ में भगवान मिलते हों। इसलिए बहुत से लोग ऐसा कहने लगते हैं कि भगवान तो हैं ही नहीं, जो हैं वह हम ही हैं और यहीं हम यानी अहंकार का भाव उत्पन्न होने लगता है।
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अहंकार उत्पन्न होते ही भगवान से दूरियां और बढ़ जाती है लेकिन अगर एक बात का ध्यान रखा जाए तो भगवान को अनुभव कर पाएंगे और उनसे मिलन भी हो सकता है। ओशो कहते हैं कि स्त्री का मार्ग है। लेकिन ऐसा नहीं है कि पुरुष उस मार्ग पर नहीं जा सकते।

पुरुष को भी जाना हो, तो उसके मन में परमात्मा के प्रति प्रेयसी वाली भाव दशा चाहिए। भक्ति के मार्ग पर पुरुष भी स्त्री होकर ही प्रवेश करता है। स्त्रैण होने का आध्यात्मिक अर्थ होता है, ग्राहक होना, रिसेप्टिव होना।
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पुरुष है आक्रामक, एग्रेसिव, हमलावर। बायोलॉजिकली भी, जैविक व्यवस्था में भी पुरुष हमलावर है। स्त्री ग्राहक है। गर्भ है। वह स्वीकार करती है, समा लेती है, आत्मसात कर लेती है। हमला नहीं करती है।
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भीतर छ‌िपी जो स्‍त्री है उसे व‌िकस‌ित करना होगा

भक्त‌ि का मार्ग भी ऐसा ही है यानी ग्राहक, स्वीकार करने का मार्ग है। वह स्‍त्रैण है। वहां परंपरा को अपने भीतर स्वीकार करना है। श्रद्धापूर्वक, नत होकर, स‌िर झुकाकर उसे अपने भीतर झेल लेना है। भगवान का गर्भ बन जाता है भक्त। वह पुरुष है या स्‍त्री, इससे कोई सवाल नहीं। लेक‌िन जो गर्भ नहीं बन सकता भगवान के ल‌िए, वह भक्त नहीं बन सकता।

आपको शायद हैरानी हो सकती है लेक‌िन यह सच है क‌ि एक ऐसा भी भक्तों का संप्रदाय हुआ है, ज‌िनमें पुरुष भी स्‍त्र‌ियों के ही कपड़े पहनते हैं। अब भी बंगाल में उस संप्रदाय को मानने वाले कुछ लोग हैं। यह रात को सोते भी हैं तो परमात्मा की मूर्त‌ि साथ लेकर सोते हैं, जैसे कोई प्रेयसी अपने प्रेमी को साथ लेकर सो रही हो।

यह बात बड़ी अजीब-सी लगेगी, क्‍योंक‌ि हमें इसके भीतर के रहस्य का कोई पता नहीं है और ज‌िस बात के भीतर के रहस्य का हमें कोई पता न हो, बड़ी अड़चन होती है। क्या आपने कभी ख्याल क‌िया क‌ि दुन‌िया के सभी धर्मों ने, चाहे वे भक्त-संप्रदाय हों या न हों, ज‌िन गुणों को मूल्य द‌िया है, वे स्‍त्रैण हैं। चाहे महावीर उसको अह‌िंशा कहते हों। चाहे जीसस उसको प्रेम कहते हों। ये सब स्‍त्रैण गुण हैं। स्‍त्री अगर पूरी तरह प्रकट हो, तो ये गुण उनमें होंगे।

इसका मतलब यह हुआ क‌ि अगर आपको भीतर की तरफ जाना है, तो आपको भीतर छ‌िपी जो स्‍त्री है, उसके गुणों को आपको व‌िकस‌ित करना होगा। और अगर स्‍त्र‌ियों को भी बाहर की तरफ जाना है, तो उनके भीतर छ‌िपा हुआ जो पुरुष है, उनको उसे व‌िकस‌ित करना होगा। बह‌िर्यात्रा पुरुष के सहारे हो सकती है। अंतर्यात्रा स्‍त्री के सहारे।
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