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जीवन के तराजू का पलड़ा बराबर रखें: ओशो

Thu, 17 Jan 2013 12:59 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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परमात्मा बाहर भी है और भीतर भी। वस्तुतः बाहर और भीतर का भेद अज्ञान-आधारित है। बाहर भी उसी का है, भीतर भी उसी का है; एक ही आकाश व्याप्त है। लेकिन मन के लिए सदा आसान है चुनाव करना। मन चुनने की कला है। तो यह तो मन बाहर देखता है या भीतर। अगर मन दोनों को देख ले, तो मन मिट जाता है। दोनों को एक साथ देख लेने वाला व्यक्ति न तो अंतर्मुखी होता है, न बहिर्मुखी।
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कार्ल गुस्ताव जुंग ने आदमियों के दो विभाजन किए हैं, अंतर्मुखी, इंट्रोवर्ट और बहिर्मुखी, एक्सट्रोवर्ट। अंतर्मुखी धीरे-धीरे बाहर से संबंध छोड़ देता है; बहिर्मुखी धीरे-धीरे अंतर से संबंध छोड़ देता है। दोनों के जीवन एकांगी हो जाते हैं। जैसे तराजू का एक ही पलड़ा भारी हो जाता है। एक जमीन छूने लगता है, एक आकाश में अटक जाता है। जबकि जीवन ऐसा तराजू होना चाहिए कि, कांटा मध्य में सधा रहे। बाहर और भीतर दोनों समान अनुपात में सधें।

यह अब तक नहीं हो पाया। पूरब ने भीतर को साधने में बाहर की उपेक्षा कर दी। वहीं पूरब का पतन हुआ। वहीं भारत गिरा और अब तक नहीं उठ पाया। पश्चिम ने बाहर को सम्हालने में भीतर खो दिया। दोनों के आकर्षण हैं। दोनों के लाभ हैं। दोनों की हानियां हैं। अंतर्मुखी व्यक्ति शांत हो जाता है; जीवन में तनाव कम हो जाता है, भाग-दौड़ रुक जाती है। लेकिन अंतर्मुखी व्यक्ति अगर अतिशय अंतर्मुखता से भर जाए, तो धीरे-धीरे दीन हो जाएगा।
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शांति तो रहेगी, लेकिन दरिद्र हो जाएगा। भीतर तनाव न रहेगा, लेकिन बाहर जीवन की सुख-सुविधा खो जाएगी। बहिर्मुखी व्यक्ति बाहर तो बड़ा आयोजन कर लेता है, भीतर चिंता से भर जाता है। बाहर तो बहुत सुख हो जाएगा, भीतर उसी मात्रा में दुख संगृहीत हो जाएगा। भारत के मनिषियों ने बड़े ऊंचे शिखर छुए, लेकिन वे शिखर अंतर्मुखता के थे, अधूरे थे। परमात्मा पूरा न था उनमें।

पश्चिम ने बड़े शिखर छू लिए हैं। पश्चिम के भवन पहली दफा गगनचुंबी हुए हैं, आकाश को छू रहे हैं। बड़ा फैलाव है विज्ञान का। शक्ति बढ़ी है विनाश की, सृजन की। लेकिन भीतर आदमी बिलकुल ही पीड़ा, ग्लानि, पाप, अंधकार से भरा है। बाहर तो खूब रोशनी हो गई है, बाहर की रात तो करीब-करीब मिट गई है। भीतर की रात अमावस हो गई है। वहां चांद का कोई दर्शन ही नहीं होता, वहां तारे भी छिप गए हैं। ध्यान रखना कि मन को हमेशा सुविधा है दो में से एक को चुनना की, क्योंकि मन द्वंद्व है। एक को चुनो, द्वंद्व जारी रहता है, संघर्ष जारी रहता है। दोनों को एक साथ चुन लो, द्वंद मिट जाता है, अद्वैत फलित हो जाता है।
 
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन
गीता दर्शन, भाग-8
प्रवचन नं. 8 से संकलित
ओशो परिचय
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये। ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये। 
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