मनुष्य-जाति का इतिहास, मनुष्य की चेतना सीधी रेखा में यात्रा नहीं करती। जबकि पश्चिम में ऐसी ही धारणा है कि एक सीधी रेखा में मनुष्य विकास कर रहा है। डार्विन, मार्क्स और अन्यों की भी वैसी ही धारणा है। लेकिन उस धारणा में बहुत बल नहीं है। पूरब की धारणा है कि जीवन का विकास रेखा-बद्ध नहीं है, वर्तुलाकार है, सरक्युलर है।
हम किसी सीधी रेखा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं, हम एक वर्तुल में घूम रहे हैं। और यह बात ज्यादा उचित भी मालूम पड़ती है। बच्चा पैदा होता है। जन्म से एक रेखा शुरू होती है और बुढ़ापे में आकार वहीं मृत्यु घटित होती है, जहां जन्म हुआ था, वर्तुल पूरा हो गया।
हम बच्चे से बूढ़ापे तक के विकास में सीधा विकास नहीं देखते,एक ऊंचाई आती है, फिर उतार शुरु होता है। मौसम बदलते हैं प्रकृति की तो कोई सीधी रेखा नहीं है-गर्मी जाती है, गर्मी फिर आती है; वर्षा जाती है, वर्षा फिर आती है-एक वर्तुलाकार, जैसे गाड़ी का पहिया घूमता हो।
सूरज, चांद-तारे, पृथ्वी, सभी वर्तुलाकार घूमते हैं। तो वर्तुल जीवन की व्यवस्था मालूम होती है। मनुष्य का इतिहास भी वर्तुलाकार है। ऊंचाइयां आती हैं, नीचाइयां आती हैं; विकास होता है, पतन होता है। और जहां से शुरू होती है यात्रा, वहीं पूरी भी होती है। ऐसी ही घड़ी में, जब जीवन एक छलांग लेता है वर्तुल में, संकट उपस्थित होता है।
ऐसा संकट आज उपस्थित है। इस संकट को समझने के लिए दो बातें जरूरी हैं। जैसा जीवन वर्तुलाकार है, ऐसा ही जीवन द्वंद्वात्मक भी है, डायलेक्टिकल है। और कोई भी चीज अकेली नहीं है, उसका विपरीत साथ में सदा मौजूद है। जब पूरब धार्मिक होता है, तो पश्चिम बौद्धिक होता है।
जब पश्चिम धार्मिक होता है, तो पूरब बौद्धिक हो जाता है। और ये पूरब और पश्चिम एक पूर्णता को दो हिस्सों में विभाजित करते हैं। पूरब धार्मिक था अतीत में, आज पूरब बौद्धिक हो रहा है। पश्चिम कल तक बौद्धिक था, आज धार्मिक हो रहा है।
पश्विम में आज सबसे बड़ी जो तलाश है, वह ध्यान की है। पश्चिम से लोग पूरब की तरफ आ रहे हैं ध्यान की खोज के लिए,शांति की खोज के लिए। आत्मा-परमात्मा की क्या कोई प्रतीति संभव है-यह जीवन का जैसे महत्वपूर्ण से महत्वपूर्ण बिंदू हो गया है।
पूरब में लोग हंसते हैं। धन बड़ी चीज है। और अगर पूरब से कोई पश्चिम की तरफ जाता है, तो विज्ञान की खोज में जाता है, धर्म की खोज में नहीं। पूरब से भी पश्चिम की तरफ लोग जा रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय, विज्ञान, टेक्नोलॉजी, अणुविज्ञान, इसकी तलाश में जा रहे हैं।
पश्चिम से लोग पूरब की तरफ आ रहे हैं आत्मा और परमात्मा की खोज के लिए। यह बड़ी अनूठी घटना है कि पश्चिम पूरब के चरणों में बैठने को राजी है, अगर धर्म मिल सकता हो। और पूरब पश्चिम के चरणों में बैठने को राजी है, अगर धन मिल सकता हो।
एक संकट की घड़ी है, जहां गाड़ी का चाक पूरा का पूरा घूमने को तैयार है। जो ऊपर था, वह नीचे आ जाएगा; और जो नीचे था, वह ऊपर आ जाएगा। मूल्य रूपांतरित हो जाएंगे। गाड़ी के चाक में जो आरा ऊपर है, वह नीचे जा रहा है, जो नीचे है, वह ऊपर आ रहा है। यह संकट की घड़ी है, क्राइसिस है। इसमें सभी पुरानी व्यवस्थाएं अस्त-व्यस्त हो जाएंगी, इसमें अराजकता सघन हो जाएगी।
साभारः ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन