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जब एक अमेरिकी महिला का ओशो में रस जगा

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ओशो ने अपने जीवन काल में कहा था। मैं तुम्हारे लिए जिंदा हूं, तुम मेरे लिए जिंदा हो। इन दोनों जिंदगियों के बीच में कुछ घटेगा। जब मैं कल जा चुका होऊंगा, तुम्हारे बच्चों और मेरे बीच कैसे कुछ घटेगा? हां, इतना जरूर तुम अपने बच्चों को बता जाना कि इस तरह की घटना घटती है, खोजना; हमें मिल गया था, तुम्हें भी मिल जायेगा।
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कोई न कोई मिल जाएगा-कोई जाग्रत पुरुष; तुम उसके चरणों में झुकना। मगर तुम मेरी तस्वीर या मेरी मूर्ति अपने बच्चों के लिए मत छोड़ना मैं एक मुर्दा मूर्ति रहूंगा। वे मेरी पूजा कर देंगे, पानी डालकर स्नान करवा देंगे, दातून रख देंगे, मगर मूर्ति के लिए इनका कोई अर्थ नहीं होगा। यह सब व्यर्थ होगा।

और चूंकि वे इस मूर्ति में उलझे रहेंगे, इसलिये कोई जिंदा गुरु उनके द्वार से भी गुजरेगा तो वे देखेंगे नहीं। वे कहेंगे: हमें जरूरत ही नहीं, हमारे गुरु तो हैं, हम तो उनकी पूजा करते हैं, हम तो उनको मानते हैं। इसी क्रम में ओशो ने अपने जीवन की एक रोचक घटना बताई...
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जब अमेरिकी महिला आई ओशो के पास

एक महिला मेरे पास आई। उसका रस मुझमें जगा है, नहीं तो दूर अमरीका से आती न! वृद्ध महिला है। लेकिन एक बड़ी अड़चन आ गई। अड़चन यह है कि वह कहती है कि बचपन से ही मैं मानती रही हूं कि जीसस मेरे गुरु हैं, अब दो गुरु कैसे बनाऊं? मैंने उसको कहा कि अगर जीसस तेरे गुरु हैं तो तू यहां आई ही क्यों?

अगर जीसस के गुरु होने से काम पूरा हो गया तो काम पूरा हो गया। अगर जीसस के गुरु होने से काम पूरा नहीं हुआ तो जीसस तेरे गुरु कैसे? बात खत्म कर!...जीसस रहे होंगे तेरे बाप-दादों के गुरु। यह कोई धन थोड़े ही है कि वसीयत में मिल जाए। बाहर का धन वसीयत में मिलता है, भीतर का धन वसीयत में नहीं मिलता। और बाहर के धन और भीतर के धन के ढंग ही अलग होते हैं। तुम्हारे बाप मरेंगे तो उनकी तिजोड़ी पर तुम हकदार हो जाओगे।

लेकिन तुम्हारे बाप मरेंगे तो उनके आनंद-अनुभूति के, उनके समाधि के, उनके ध्यान के तुम हकदार नहीं हो जाओगे। भीतर का धन ऐसे नहीं दिया जाता कि उसकी वसीयत कर दी कि मरते वक्त जैसे वसीयत लिख गये कि मेरा सारा धन मेरे बेटे का और मेरी समाधि भी, और मेरा ध्यान भी इसी का। कि मेरे चार बेटे हैं तो चारों समाधि को बांट लेना। ध्यान या समाधि बांटी नहीं जाती, न दी जाती न ली जाती।
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पति के साथ विभेद का डर

अब यह महिला आई दूर से, मगर चूक जायेगी। अब उसको एक अड़चन आ रही है। उसके पति भी आए हैं, पति संन्यस्त हो रहे हैं, अब और अड़चन खड़ी हो गई। उसने मुझे कल फिर पत्र लिखा कि एक और अड़चन आ गई। मैं तो अड़चन में थी ही कि क्या करूं क्या न करूं, अब पति संन्यस्त हो रहे हैं, तो कहीं ऐसा तो नहीं हो जायेगा कि पति के गुरु एक, मेरे गुरु दो, तो हम दोनों में भेद हो जाये और हम एक-दूसरे के विपरीत पड़ जाए?

अगर जीसस से तुम्हारे जीवन में शांति आ गई तो बात समाप्त हो गई। तुम्हारे पति के जीवन में मुझसे शांति आयेगी तो विरोध कैसे पड़ जायेगा? दो शांतियां सदा एक हो जाती हैं। दो अशांतियों में विरोध हो सकता है। मगर पत्नी को कोई शांति इत्यादि आई नहीं है, नहीं तो यहां तक आती क्यों?

ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली
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