जॉन भारतीय सेना का एक अफसर था। एक बार जब वह सीमा की रखवाली कर रहा था, तब एक विस्फोट से उसके दोनों पैर जख्मी हुए और उन्हें काटकर अलग करना पड़ा। तब वह महज तीस साल का था। उसका जीवन जैसे वहीं रुक गया। उसे लगता था कि अब वह किसी काम का नहीं रह गया। दिन-रात वह शराब के नशे में धुत्त पड़ा रहता। एक दिन वह अपने एक पुराने दोस्त की शादी में गया। उसे रात में ठीक से नींद नहीं आती थी, इसीलिए वह होटल के स्विमिंग पूल के किनारे बैठा शराब पी रहा था।
रात के तीन बज रहे थे कि तभी उसे एक महिला की चीख सुनाई दी। वह जब पलटा, तो देखा कि वह महिला स्विमिंग पूल के दूसरे किनारे पर खड़ी जोर-जोर से चिल्ला रही थी। व्हील चेयर में बैठा जॉन तेजी से महिला की ओर गया। दरअसल महिला की छोटी-सी बच्ची फिसलकर पूल में गिर गई थी। पूल काफी गहरा था और उस महिला को तैरना नहीं आता था। इस कारण वह बेहद डर गई थी। उस बच्ची को पानी में छटपटाते हुए देखकर जॉन ने अचानक ही स्विमिंग पूल में छलांग लगा दी। उसने एक हाथ से बच्ची को पकड़ रखा था और एक हाथ से तैरने की कोशिश कर रहा था। तब तक होटल के कर्मचारी भी वहां पहुंच चुके थे। उन्होंने जॉन और बच्ची को पूल से सुरक्षित बाहर निकाला और तुरंत स्थानीय डॉक्टर को बुलाकर दोनों की जांच करवाई।
अगले दिन वह महिला जॉन का धन्यवाद देने आई और बोली, आपने कल मुझे जिंदगी का एक बहुत बड़ा सबक सिखाया। मेरे हाथ पैर सलामत थे, इसके बावजूद मैं स्विमिंग पूल में उतरने में कतरा रही थी। जबकि लाचार होने के बावजूद आपने पूल में छलांग लगा दी। आपने मुझे कल रात यह सिखा दिया कि इंसान के पास अगर किसी चीज की कमी है, तो वह है सिर्फ उसकी सोच। अगर वह सोच ले, तो कुछ भी कर सकता है। महिला की उस बात ने जॉन के निराश जीवन को भी उम्मीद से भर दिया।