नम्रता इंजीनियरिंग के दूसरे साल में थी। उसकी मुलाकात एक वैज्ञानिक से हुई, जिन्होंने भारत में विज्ञान के क्षेत्र में कई नए आविष्कार किए थे। उन्होंने नम्रता से कुछ देर बात की और फिर कहा कि वह भी उनके जैसे बन सकती है अगर वह अपने विचारों को आविष्कारों में परिवर्तित करे। तभी से नम्रता का दिमाग कुछ नया बनाने में लगा हुआ था। पर जब भी वह अपने आविष्कार के नजदीक होती, कुछ-न-कुछ ऐसा हो जाता कि उसे सफलता प्राप्त नहीं हो पाती।
एक बार कॉलेज में जलसा हुआ। जलसे में मुख्य अतिथि के तौर पर एक प्रमुख विशेषज्ञ श्री यशपाल जी को आमंत्रित किया गया। नम्रता ने सोचा यही मौका है, मैं अपनी सारी परेशानियों का हल ढूंढ सकती हूं। मौका देख वह उनसे मिलने के लिए पहुंची। उन्होंने नम्रता की बात सुनी और फिर बोले, मुझे यह बताओ कि तुम ये सारे आविष्कार क्यों करना चाहती हो। नम्रता बोली, मैं कुछ नया बनाना चाहती हूं। यशपाल जी बोले, फिर क्या होगा?
वह बोली, फिर मैं उसे लोगों की मदद करूंगी। ऐसा होने से मेरा नाम होगा। यशपाल जी बोले, और फिर तुम्हें खुशी मिलेगी, है न। तुम चैतन्य हो जाओगी कि तुमने विश्व को कुछ दिया। नम्रता कुछ बोले, इससे पहले ही यशपाल जी बोले, बेटा, कुछ अच्छा, कुछ नया बना पाना भी एक लालच है।
इसकी वजह से हम कुछ अच्छा करने की सोचते तो हैं, पर क्योंकि हमें उसे पूरा होता देखने की जल्दी होती है, तो हम उसको अपना पूरा समय देते ही नहीं। अगर कोई सवाल हल नहीं हो रहा हो, तो यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसका जवाब ही नहीं है। चुनौतियों को पार करने के लिए सिर्फ दो बातों की जरूरत होती है-लगन और विश्वास। तुम्हारा रास्ता बिलकुल सही है, लेकिन उस रास्ते पर चलने का तरीका तुम्हे सफलता तक नहीं पहुंचने दे रहा।