राजाराम एक बहुत बड़े व्यापारी थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में हमेशा कठिनाइयों का सामना किया था। पर मुश्किलों से हारना उन्होंने कभी सीखा नहीं था। उनका एक बेटा था रमन। रमन डॉक्टर बनना चाहता था। वह दसवीं से ही पीएमटी परीक्षा के लिए तैयारी कर रहा था, ताकि उसे किसी अच्छे मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिल जाए।
बारहवीं के बाद रमन ने पहली बार पीएमटी परीक्षा दी, पर उसमें उसका चयन नहीं हो पाया। काफी से तैयारी करने के बाद भी चयन न होने से रमन एकदम टूट गया। उसने एक बार फिर डटकर पढ़ाई की। लेकिन एक बार फिर उसका चयन नहीं हुआ। अब उसकी हिम्मत जवाब दे चुकी थी। पांच साल तैयारी करने के बाद भी उसे कुछ हासिल नहीं हुआ। उसने अपने पिता से कहा, अब मेरा डॉक्टर बन पाना मुश्किल है।
शायद मेरे अंदर वह बात नहीं। रमन के पिता बोले, तुम सही कह रहे हो बेटा। मैंने भी यही सोचा था, जब मैंने नया-नया व्यापार शुरू किया था। रमन हक्का-बक्का अपने पिता को देखने लगा। वह बोले, अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर जब मैंने यह व्यापार शुरू किया, तो पहले तीन-चार साल मेरा बहुत नुकसान हुआ। मेरी गाड़ी, मेरा घर सब कुछ बिक गया।
यह हालत हो गई कि दो वक्त की रोटी भी मैं तुम्हें और तुम्हारी मां को नहीं खिला पाया। उस वक्त मेरे पास दो विकल्प थे, जो मैं आज तुम्हें दे रहा हूं। पहला, जो हुआ उसे भूलकर नई राह चुनो और नए सिरे से शुरुआत करो। और दूसरा, अपने ऊपर विश्वास रखो और अपनी विफलताओं को आने वाली सफलता के लिए सीढ़ी बनाओ। उस दिन से रमन ने खुद को पीएमटी की अपनी आखिरी परीक्षा की तैयारी में झोंक दिया। इस बार उसकी ऊर्जा, उसका संकल्प पहले से कहीं ज्यादा दृढ़ और मजबूत था।