नशेबाजी की बुरी आदतों में तंबाकू का व्यसन बहुत बुरी तरह फैल गया है। यह दुर्व्यसन इतना सामान्य तथा व्यापक हो गया है कि लोगों के दैनिक जीवन का एक अंग बन बैठा है और मित्रों, मेहमानों को सिगरेट-बीड़ी आदि भेंट करना आदर अभिव्यक्ति का एक अंग मान लिया गया है। इसे समाज के लिए दुर्भाग्य के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता है।
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शिक्षित वर्ग तम्बाकू के दुर्व्यसन को फैशन के रूप में स्वीकार किये हुए हैं, तो अशिक्षित सर्वसाधारण उसे एक नियमित पेय पदार्थ के रूप में स्वीकार कर चुका है। बीड़ी, सिगरेट उसके नियमित दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन चुका है।
वस्तुतः सभी दृष्टिकोण से तम्बाकू विष ही है। उसे मन्थर विष भी कहा जाता है। विष से तुरन्त मृत्यु हो जाती है जबकि मन्थर विष मृत्यु का बीज बो देता है। तम्बाकू जैसी वस्तुओं को लोग निःसंकोच होकर अपना लेते हैं और धीरे-धीरे अपने को गलाते हुए अपना जीवन नष्ट करते रहते हैं।
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धूम्रपान और तंबाकू का यह असर आपको अंदर तक हिला देगा
तम्बाकू सेवन से उसका विष मनुष्य के रक्त में उत्तेजना उत्पन्न कर देता है जिसके प्रभाव से मनुष्य की विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियाँ जाग उठती हैं और वह मानसिक और शारीरिक रूप से कुमार्गगामी हो जाता है। जिसके शरीर में विष का प्रभाव होगा, उसका मन अवश्य विषैला होगा और जिसका मन विषैला होगा, उसकी बुद्धि कुटिल होगी। वह अपराध अथवा अनैतिक मार्ग पर जाएगा ही। यह एक ऐसा वैज्ञानिक प्रतिक्रियात्मक क्रम है, जिसमें व्यतिक्रम होना संभव नहीं है।
तम्बाकू में चार प्रकार के पदार्थ होते हैं, जो निकोटिन, कोलतार, आर्सेनिक और कार्बन मोनोक्साइड अथवा कोयले की गेरू कहे जाते हैं। निकोटिन से हमारी घ्राण-शक्ति (सुगन्ध और दुर्गन्ध जानने की शक्ति) कमजोर हो जाती है। नाक के पर्दे भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। आँखों की ज्योति पर भी निकोटिन के विष का बुरा प्रभाव पड़ता है। धूम्रपान करने वालों की पाचन प्रक्रिया बिगड़ जाती है और वे कब्ज एवं अपच की बीमारी के शिकार हो जाते हैं।
निकोटिन से ब्लड प्रेशर बढ़ता है। रक्त की नलियों में रक्त का स्वाभाविक संचार मंद पड़ जाता है और त्वचा सुन्न होने लगती है, जिससे तरह-तरह की त्वचा की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। निकोटिन का धुआं जीर्ण खाँसी का रोग भी पैदा कर देता है। रोग बढ़कर दमा, श्वास और तपेदिक का रूप धारण कर लेता है।
तम्बाकू के विषैले प्रभाव के कारण मनुष्य में क्रोध-वृत्ति प्रबल हो जाती है, क्योंकि तम्बाकू का सेवन करते-करते मन, मस्तिष्क दोनों कमजोर हो जाते हैं और उसमें इतना हलकापन आ जाता है कि वह छोटी-छोटी बातों को भी सहन करने में असमर्थ हो जाता है। थोड़ा सा कारण उत्पन्न होने पर ही वह आपे से बाहर हो जाता है। इस प्रकार क्रोध की अधिकता से स्मृति तथा विवेक बुद्धि विकृत हो जाती है और मस्तिष्क में उत्तेजना बनी रहती है। तम्बाकू से बुद्धि को हानि पहुँचना एक ऐसा सुनिश्चित तथ्य है कि उस दृष्टि से प्रत्येक चिकित्सा विज्ञानी इसका निषेध करता है। तम्बाकू तमोगुण की जननी है। तमोगुण मनुष्य के आचरण को भ्रष्ट कर देता है।
अनेक लोगों का विचार है कि पीने की अपेक्षा तम्बाकू खाना अथवा सूँघना कम हानिकारक है, किन्तु यह धारणा गलत है। धूम्रपान करने से जहाँ तम्बाकू का जहर जलकर धुएँ के रूप में शरीर में पहुँचता है, वहाँ तम्बाकू खाने से उसका जहर अपनी पूरी शक्ति के साथ शरीर के अंग-प्रत्यंगों में जम जाता है। उससे शरीर के दाद-खाज, छाजन आदि रोग जड़ जमा लेते हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से भी तम्बाकू त्याज्य है। प्राचीन ग्रंथों में अनेक स्थानों पर धूम्रपान का निषेध किया गया है, यथा-यत्स्वधर्मार्जितं पुण्यं तन्नष्ट धूम्रपानतः। अर्थात् स्वधर्म का आचरण करके जो पुण्य अर्जित किया जाता है, वह सब धूम्रपान से नष्ट हो जाता है। इससे यह विदित होता है कि नशे के रूप में किसी भी प्रकार के धूम्रपान के दोषों से प्राचीन समय के विचारक तथा उद्घोषक परिचित थे, इसलिए इसे हेय और त्याज्य बतलाया है।
अतएव स्वास्थ्य, परिवार, समय, मानव समाज तथा सम्पूर्ण राष्ट्र का तकाजा है कि समस्त भारतवासियों को तम्बाकू जैसे हानिकारक तथा तुच्छ व्यसन को स्वयमेव तो त्याग ही देना चाहए, साथ ही अन्य लोगों को भी इसके दुष्प्रभाव से परिचित कराकर त्यागने के लिए प्रेरित करना चाहिए।