ऐसे व्यक्ति की कथा, जिसने अपने बेटों को एक ही दिन संत के पास भेजकर उन्हें जीवन की सीख दी।
एक व्यक्ति के चार बेटे थे। वह उन्हें जीवन की बहुमूल्य शिक्षा देना चाहते थे। बहुत सोच-विचार के बाद उन्होंने बेटों से एक ही दिन में अलग-अलग समय पर शहर के जाने-माने संत राधेमोहन जी से मिलकर आने को कहा। चारों बेटे उनसे मिलकर वापस लौटे। फिर पिता ने अपने बेटों को बारी-बारी से बुलाकर संत के बारे में राय जाननी चाही। बड़े बेटे ने बताया कि जब मैं उनके पास गया, तो वह बहुत गुस्से में थे और किसी को जोर-जोर से डांट रहे थे।
मुझे तो वह बहुत क्रोधी स्वभाव के लगे। दूसरे बेटे ने बताया कि जब मैं वहां पहुंचा, तो वह अपने परिवार के साथ बैठे थे और अपने बच्चों से प्यार से बातें कर रहे थे। मैंने उनके घर पर ढेर सारे पालतू जानवर भी देखे। अतः मुझे तो वह बहुत स्नेहिल और निर्मल हृदय वाले व्यक्ति लगे। तीसरे बेटे ने बताया कि जब मैं उनसे मिलने पहुंचा, तब, वह उत्सव में व्यस्त थे और नृत्य व संगीत का आनंद ले रहे थे। वह जितना अच्छा गा रहे थे, उतना ही अच्छा नाच भी रहे थे। इसलिए मुझे तो वह कलाप्रेमी व्यक्ति लगे। अंत में सबसे छोटे पुत्र ने अपना अनुभव बताया कि जब मैं उनके पास पहुंचा, तो वह पैसों का हिसाब किताब कर रहे थे और किसी अन्य व्यक्ति से कर्ज के लेन-देन की बात कर रहे थे।
उस व्यक्ति के रोने-बिलखने के बावजूद वह टस से मस नहीं हो रहे थे। इसलिए मुझे तो वह बहुत ही लोभी और सख्त किस्म के व्यक्ति लगे। तब पिता ने कहा कि तुम चारों ही सही हो, क्योंकि जो तुमने देखा, उसके अनुसार ही अपनी राय बनाई। एक ही व्यक्ति के बारे में तुम चारों के विचार कितने अलग हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति या वस्तु के बारे में एकदम से कोई राय नहीं बनानी चाहिए। हर व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरह से व्यवहार करता है।