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मिलिए अपनी ही कार्बन कापी से

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यदि अपना ही प्रतिरूप सामने दिखाई दे तो उसे क्या कहेंगे? भूत, भ्रम या सत्य? लेकिन अध्यात्म विज्ञानियों के अनुसार इस तरह की घटनाएं सच भी हो सकती हैं। अध्यात्मविदों के अनुसार छाया-पुरुष की साधना करते हुए अपनी छाया या प्रतिबिंब को इतना जीवंत बनाया जा सकता है। यदा-कदा बिना कोई साधना किए यही छाया-पुरुष लोगों के सामने प्रकट भी हो जाते हैं।
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प्रख्यात जर्मन कवि जोहानन उल्फगैंग वान गोएथ ने अपनी आत्मकथा में एक ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख किया है। सन 1771 की एक सुबह वह घोड़े पर सवार होकर एक सुनसान रोड पर ड्जेनहीम (जर्मनी) की ओर चले जा रहे थे, तभी पीछे से एक घुड़सवार तेजी से आया और आगे निकल गया।

अभी वह कुछ सोच पाते कि सामने एक अद्भुत दृश्य दिखाई पड़ा। उसी सड़क पर उनकी ओर आते हुए एक दूसरा घुड़सवार दिखाई पड़ा। वह घुड़सवार बिल्कुल उनकी कार्बन कापी था।
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अभी इसी असमंजस में थे कि यह दूसरा गोएथ कहां से कैसे आ गया? कुछ ही पल में दृश्य गायब हो गया। जॉन बास्को ने अपनी कृति स्ट्रेंज एनकांउण्टर्स में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन किया है, जब व्यक्ति को अपने ही ब्लू प्रिन्ट से सामना हो गया हो।

1929 को रोमन पादरी सन्त आर्थर बर्जर का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि एक दोपहर को उन्होंने अद्भुत दृश्य देखा। उन्होंने सामने ही एक आभावान, कुहरे जैसी हूबहू अपनी ही अनुकृति देखी। अनुकृति की निगाहें आर्थर बर्जर पर टिकी थी। दोनों एक दूसरे को पांच सेकेण्ड तक निहारते रहे, फिर अचानक बर्जर की प्रतिमूर्ति आंखों से ओझल हो गई।

पढ़ने सुनने में ऐसी घटनाएं बड़ी अटपटी जान पड़ती हैं और दृष्टिभ्रम सी लगती है, पर साधना विज्ञान के छाया-पुरुष वाली मान्यता उक्त भ्रान्ति को निर्मूल साबित कर देती है, जिसमें कहा गया है कि साधना-विज्ञान में अपना ही प्रतिरूप तैयार कर लेने और उससे तरह-तरह के कार्य करवा लेने में आश्चर्य अथवा अचम्भा जैसा कुछ भी नहीं है।
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