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क्या आप जानते हैं रास क्या है: ओशो

Thu, 22 Aug 2013 02:13 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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रास को समझने के लिए पहली जरूरत तो यह समझना है कि सारा जीवन ही रास है। जैसा मैंने कहा, सारा जीवन विरोधी शक्तियों का सम्मिलन है। और जीवन का सारा सुख विरोधी के मिलन में छिपा है। तो पहले तो रास का जो मूल अर्थ है वह समझ लेना जरूरी है। फिर कृष्ण के जीवन में उसका क्या अर्थ है, वह समझना चाहिए।
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चारों तरफ आंखें उठाएं तो रास के अतिरिक्त और क्या हो रहा है? आकाश में दौड़ते हुए बादल हों, सागर की तरफ दौड़ती सरिताएं हों, बीज फूलों की यात्रा कर रहे हों या भंवरे गीत गाते हों। पक्षी चहचहाते हों, या मनुष्य प्रेम करता हो अथवा ऋण और धन विद्युत आपस में आकर्षित हो रही हों। स्त्री और पुरुष की निरंतर लीला और प्रेम की कथा चलती हो। इस पूरे फैले हुए विराट को हम देखें तो रास के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हो रहा है।

रास का बहुत ही गूढ अर्थ रखता है। इसका बहुत ही विराट रूप है। पहला तो यही कि इस जगत के विनियोग में, इसके निर्माण में, इसके सृजन में जो मूल आधार है, वह विरोधी शक्तियों के मिलन का आधार है। एक मकान हम बनाते हैं, एक द्वार हम बनाते हैं, तो द्वार में उलटी ईंट लगा कर अर्धचन्द्र बन जाता है। एक-दूसरे के खिलाफ लगी ईंट पूरे भवन को संभाल लेती हैं। हम चाहें तो एक सी ईंट लगा सकते हैं।
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तब द्वार नहीं बनेगा, और भवन तो उठेगा नहीं। शक्ति जब दो हिस्सों में विभाजित हो जाती है, तो खेल शुरू हो जाता है। शक्ति का दो हिस्सों में विभाजित हो जाना ही जीवन की समस्त पर्तों पर, समस्त पहलुओं पर खेल की शुरुआत है। शक्ति एक हो जाती है, खेल बंद हो जाता है। शक्ति एक हो जाती है तो प्रलय हो जाती है। शक्ति दो में बंट जाती है तो सृजन हो जाता है।

रास का जो अर्थ है, वह सृष्टि की जो धारा है, उस धारा का ही गहरे से गहरा सूचक है। जीवन दो विरोधियों के बीच खेल है। ये विरोधी लड़ भी सकते हैं, तब युद्ध हो जाता है। ये दो विरोधी मिल भी सकते हैं, तब प्रेम हो जाता है। लेकिन लड़ना हो कि मिलना हो, दो की अनिवार्यता है। सृजन दो के बिना मुश्किल है। कृष्ण के रास का क्या अर्थ होगा इस संदर्भ में?
 
इतना ही नहीं है काफी कि हम कृष्ण को गोपियों के साथ नाचते हुए देखते हैं। यह हमारी बहुत स्थूल आंखें जो देख सकती हैं, उतना ही दिखाई पड़ रहा है। लेकिन कृष्ण का गोपियों के साथ नाचना साधारण नृत्य नहीं है। कृष्ण का गोपियों के साथ नाचना उस विराट रास का छोटा सा नाटक है, उस विराट का एक आणविक प्रतिबिंब है।

वह जो समस्त में चल रहा है नृत्य, उसकी एक बहुत छोटी सी झलक है। इस झलक के कारण ही यह संभव हो पाया कि उस रास का कोई कामुक अर्थ नहीं रह गया। उस रास का कोई सेक्सुअल अर्थ नहीं है। ऐसा नहीं है कि सेक्सुअल मीनिंग के लिए, कामुक अर्थ के लिए कोई निषेध है।

लेकिन बहुत पीछे छूट गई वह बात। कृष्ण कृष्ण की तरह वहां नहीं नाचते हैं, कृष्ण वहां पुरुष तत्व की तरह ही नाचते हैं। गोपिकाएं स्त्रियों की तरह वहां नहीं नाचती हैं, गहरे में वे प्रकृति हो जाती हैं। प्रकृति और पुरुष का नृत्य है रास।
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साभार:ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली
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