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कई बार हम वह काम कर जाते हैं, जिसकी अहमियत हमें पता नहीं होती

Wed, 23 May 2018 03:17 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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संदीप की कहानी, जिसने कैंसर मरीज को विमान उड़ाने की प्रक्रिया दिखाकर उसकी मां का दिल जीत लिया।

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संदीप कॉकपिट में बैठकर कैप्टन का इंतजार कर रहा था। इस बार उसकी यात्रा लंबी होने वाली थी। सवारियां अपना-अपना स्थान ग्रहण कर रही थीं। एयर होस्टेस अंजली संदीप के लिए चाय लेकर कॉकपिट में प्रवेश कर ही रही थी कि एक छोटे लड़के ने उसे जाते देख लिया और वह भी उसके पीछे-पीछे कॉकपिट में घुस गया। अंजली जब तक उसे रोकती, वह अंदर आ चुका था। संदीप ने अंजली को इशारा किया कि रोको नहीं, उसे आने दो। संदीप ने अपना काम जारी रखते हुए उस लड़के से उसका नाम पूछा। वह बोला, विकी।

संदीप ने पूछा, क्या आपने कभी कॉकपिट देखा है? वह सकुचाते हुए बोला, जी नहीं। संदीप ने कहा, कैप्टन विकी, चलो अपनी सीट पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें सिखाता हूं कि विमान कैसे उड़ाते हैं। विकी तेजी से कूदकर कैप्टन की सीट पर बैठ गया। संदीप ने उसे बताना शुरू किया ही था कि तभी पीछे से असली कैप्टन के आने की आहट हुई। वह डर गया कि विकी को देखकर कैप्टन कहीं गुस्सा न हो जाएं। पर कैप्टन ने घुसते ही विकी से पूछा, अरे कैप्टन, आप कब आए? आप क्यों चिंता करते हैं? मै हूं न प्लेन उड़ाने के लिए।
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संदीप ने कैप्टन का स्वागत किया और विकी को अपने और कैप्टन के बीच एक छोटी-सी सीट पर बिठा दिया। प्लेन के उड़ान भरने तक विकी संदीप और कैप्टन को प्लेन को नियंत्रित करते देखता रहा। जब प्लेन हवा में पहुंच गया, तो एयर होस्टेस आकर विकी को उसकी मां के पास ले गई।
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कुछ देर बाद उसकी मां कैप्टन को धन्यवाद देने आई। संदीप और कैप्टन ने कहा, यह हमारे लिए रोज की बात है। विकी की मां बोली, लेकिन यह मेरे लिए  बहुत बड़ी बात है। विकी एक कैंसर मरीज है और उसके पास सिर्फ दो महीने बचे हैं। वह हमेशा से एक पायलट बनना चाहता था। आपने जो किया, वह आपके लिए आम बात है, पर उसके लिए तो जिंदगी भर का अनुभव है।

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