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भगवान शिव के तन पर भष्म, चन्द्रमा और नीलकंठ क्यों?

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आराधना के समय शिव के जिस रूप का स्मरण किया जाता है, उसमें प्रत्येक धारणा एक खास संदेश लिए रहती है। वे संदेश जीवन के भीतरी और बाहरी पहलुओं को उजागर करती हुई किसी और ही लोक में ले जाती है।
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वह लोक अध्यात्म के उच्चतम मूल्यों को स्थापित करता हुआ ध्यान करने वाले को संस्कारित करता है।

उन प्रतीकों के अर्थ मायने रखते हैं और एक स्तर पर प्रेरित भी करते हैं। भगवान शिव के इन रुपों का अर्थ जानेंगे तो आप हैरान रह जाएंगे।
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सिर पर चन्द्रमा और नीला कंठ क्यों

शिव जी के सिर पर चंद्रमा है। चन्द्रमा शब्द का अर्थ मुदित मन है और उसका आशय है पूर्णज्ञानी और सिद्ध योगी का मन सदा मुदित रहता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव के कंठ के नीला हो जाने का कारण अमृत मंथन के समय समुद्र से निकले विष पात्र को पीने तथा उसे कंठ में ही रोके रखना है।

यह प्रसंग सिद्ध योगी की उस शक्ति का उदाहरण है जिसके कारण विष हानि नहीं पहुंचा सकते। अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीर पर पूर्ण अधिकार होने से वह विष आदि के कुप्रभाव से बचा लेता है।

शिव के तन पर भष्म का महत्व

वस्त्रादि अलंकारों से रहित अंग में राख (भभूत) लपेटने का अर्थ यह है कि योगी ने अपनी ऊर्जा को अपने शरीर में ही रमा लिया। नतीजतन वह इतना स्वस्थ और सुन्दर दिखाई देता है कि उसे बाह्य अलंकारों की आवश्यकता ही नहीं।

शिव चरित की कुछ प्रसिद्ध घटनाएं हैं। एक कथा के अनुसार गंगा विष्णु का वह पादोदक है जिसे ब्रह्मा ने वामन रूपी विष्णु के चरण धोकर अपने कमंडल में भर लिया।

भगीरथ के पूर्वजों को शाप से मुक्त करने के लिए उस पादोदक यानी गंगा को शिव जी ने मृत्युलोक में भेजा। भगीरथ के पूर्वज उन मनुष्यों के प्रतीक है जो अपने कुसंस्कारों के कारण इतने पतित हो चुके है कि उनके उद्धार के लिए प्रचंड तप पुरुषार्थ की जरूरत हुई। ज्ञान की उस गंगा का अवतरण करने का सामर्थ्य किसी अन्य में नहीं था यह केवल शिव जैसी कल्याणकारी सत्ता द्वारा ही संभव है।
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शिव के तीन नेत्रों का मतलब

शिव का तृतीय नेत्र वह मानव मेधा है जिसकी सहायता से हम संसार के पदार्थों का वह स्वरूप देख सकते है जिसका सम्बन्ध हमारे शारीरिक जीवन से न होकर आध्यात्मिक जीवन से है।

यह नेत्र विवेक बुद्धि का है जोसही और गलत को पहचानती है। साथ ही सही को अपनाती भी है। शिव मानवीय जीवन के उच्चतम आदर्श के प्रतीक है जिसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण निभ्रांत ज्ञान, योग की उच्चतम सिद्धि और तप की आवश्यकता है।
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