अभिषेक और अर्जुन बचपन के जिगरी दोस्त थे। लेकिन काम में व्यस्त होने के कारण दोनों अब ज्यादा मिल नहीं पाते थे। अभिषेक अच्छा खासा पढ़-लिखकर देश की नामचीन यूनिवर्सिटी से एमबीए फाइनेंस कर, एक बड़े बैंक में अच्छे पद पर नौकरी कर रहा था, लेकिन जाने क्यों, वह तब भी खुश नहीं था। दूसरी ओर अर्जुन शहर का जाना-माना फोटोग्राफर बन गया था। उसे बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक था और वह मां-बाप के मना करने के बावजूद अपनी जिद से फोटोग्राफर बना था। अभिषेक के विपरीत, वह अपनी जिंदगी से बहुत खुश था।
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एक दिन अभिषेक अर्जुन के घर खाने पर गया। बातचीत के दौरान अभिषेक ने अर्जुन से कहा, यार, मैंने नौकरी चुनने में गलती कर दी। मुझे भी तेरी तरह फोटोग्राफर ही बनना चाहिए था। उससे मैं कम से कम अपनी जिंदगी से खुश तो रह पाता। आज मेरे पास सब कुछ है, लेकिन खुशी नहीं है। अर्जुन यह सुनकर बोला, भाई, तुझे अगर फोटोग्राफी इतनी ही पसंद है, तो अब भी फोटोग्राफर बन जाओ। इसमें ऐसी कौन-सी बड़ी बात है! अभिषेक हंसकर बोला, यार फोटोग्राफी तो मुझे हमेशा से ही पसंद थी। लेकिन अब ज्यादा पसंद आती है, क्योंकि मेरे काम में वह मजा नहीं, जो तुम्हारे काम में है। मैं सचमुच सोच रहा हूं कि तुम्हारी तरह फोटोग्राफी शुरू कर दूं। फिर मैं भी तुम्हारी तरह ही खुश दिखूंगा।
अर्जुन बोला, तब तो तुम मेरी तरह करेले खाना भी शुरू कर दो, क्योंकि मुझे करेले बहुत पसंद हैं। मैं दिन में दो बार करेले खाता हूं, तभी तो इतना खुश नज़र आता हूं। अभिषेक हंसने लगा। अर्जुन बोला, भाई खुशी किसी काम से नहीं, अपने अंदर से आती है। सब कुछ मिलने के बाद भी हम दुखी रह सकते हैं, या फिर कुछ न मिलने पर भी खुश रह सकते हैं। यह सब हमारे जिंदगी को देखने का नजरिया है, काम तो सारे एक ही तरह के होते हैं। अभिषेक अर्जुन का इशारा समझ गया।
अमर उजाला के हरियाली और रास्ता से साभार