(1) अपने साथ पुरुषवत् व्यवहार करो। जैसे पुरुष का हृदय अनुशासनवाला, विवेकवाला होता है, ऐसे अपने प्रति तटस्थ व्यवहार करो। कहीं गलती हो गयी तो अपने मन को अनुशासित करो।
(2) दूसरों के साथ मातृवत् व्यवहार करो। जैसे माँ बालक के प्रति उदार होती है, उसी तरह दूसरों के साथ उदार व्यवहार करो। पूत कपूत हो जाय लेकिन माता कुमाता नहीं होती। इसी प्रकार दूसरों के साथ मातृवत् व्यवहार करें।
(3) भगवान के साथ शिशुवत् व्यवहार करो। जीवन सरल, स्वाभाविक, निर्दोष होगा तो भगवत्प्राप्ति सहज है और जीवन जितना अड़ा-कड़ा-जटिल होगा, छल-छिद्र-कपटयुक्त होगा, उतना भगवान हमसे दूर होंगे। भगवान राम कहते हैं : मोहि कपट छल छिद्र न भावा। अतः इनसे बचो। जैसे निर्दोष चित्त शिशु मां की गोद में अपने को डाल देता है, ऐसे ही आप भी कभी-कभी उस नारायण रूपी मां की गोद में उसी का ध्यान-चिंतन करते हुए निश्चिंत होकर लेट जाओ कि ‘मैं उस परमात्मा में, ईश्वरीय सुख में विश्रांति पा रहा हूँ... मैं निश्चिंत हूँ... जो होगा प्रभु जानें।’
इसी प्रकार पतंजलि ऋषि ने ‘पातंजल योग-दर्शन’ में सफल व्यवहार के चार सिद्धांत बताये हैं:
मैत्री:
जो श्रेष्ठ लोग हैं, सत्संगी हैं, भगवान के रास्ते जाते हैं व दूसरों को ले जाते हैं, उनसे मित्रवत व्यवहार करो। उनके साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर उनके दैवी कार्य में भागीदार हों। श्रेष्ठजनों से, अपने से ऊंचे पुरुषों से, शुद्धात्मा-पवित्रात्मा व्यक्तियों से प्रयत्नपूर्वक संबंध जोड़ें। चाहे मित्रता का संबंध जोड़ें, चाहे कोई और जोड़ें, चाहे गुरु का जोड़ें किंतु अपने से श्रेष्ठ के साथ संबंध जोड़ना यह मैत्री है।
करुणा:
आपसे जो छोटे हैं, नासमझ हैं, नौकर हैं, बच्चे हैं, कम योग्यतावाले हैं उनसे करुणाभरा व्यवहार करो। पुत्र-परिवार जो अपने अधीन हैं, जो दीन-दुःखी हैं, आप से आध्यात्मिकता में पीछे हैं, उनके प्रति करुणा रखकर व्यवहार किया जाना चाहिए। उनसे गलतियां होगी, उनका अपना स्वार्थ, अपनी आवश्यकताएं होगी फिर भी वे आप से छोटे हैं, इसलिए उनके प्रति करुणा रखकर उन्हें ऊपर उठायें। ऊपर उठाने के लिए प्यार-पुचकार व डांट-फटकार भी करुणा का ही रूप है।
मुदिता:
जो अच्छे कार्य में, दैवी कार्य में लगे हैं उनका अनुमोदन करो। जिनसे आपका संबंध नहीं है किंतु वे अच्छा काम करते हैं। उन्हें ‘भाई ! अच्छा किया। यह काम हम तो नहीं कर पाये। आपने कर दिया, बहुत अच्छा है।’ ऐसा कहकर उनका अनुमोदन करें तो अच्छाई बढ़ाने का पुण्य आपको भी मिलेगा। यह है मुदिता।
उपेक्षा:
जो निपट निराले हैं, उनको छोड़ो। उनको ठीक करने का ठेका आप लोगे तो आप परेशान हो जाओगे। ऐसे लोगों को समझो, आपके लिए पैदा ही नहीं हुए। उनकी उपेक्षा कर दो। घर, ऑफिस या दुकान में ही मान लें, दो, चार, दस, सौ या हजार सदस्य हैं। उनमें से कुछ तो ऐसे ही होंगे जो आपकी बात सुनी-अनसुनी करते रहेंगे, टाल देंगे। उनसे सावधान होकर आप धीरे-धीरे उनकी उपेक्षा कर दीजिये। उनसे लड़-झगड़कर अपना समय खराब न करें। जैसे - इंदिरा गांधी की गुरु आनंदमयी मां करती थीं।
उनके आश्रम में कुछ लोग उलटा-सीधा करते तो वे पहले एक-दो बार उन्हें संकेत करके समझातीं, किंतु यदि वे लोग सुना-अनसुना कर देते तो बाद में वे उनकी तरफ ध्यान ही नहीं देती थीं। जैसे - कुत्ता रोटी का टुकड़ा खाता है तो खाये, आपने उसकी उपेक्षा कर दी। जो महापुरुषों द्वारा उपेक्षित हो जाते हैं, उन्हें फिर शांति और आनंद से हाथ धोना पड़ता है। जो नहीं मानें उनकी उपेक्षा, जो बराबरी के हैं उनसे मुदिता, जो छोटे हैं उन पर करुणा और जो श्रेष्ठ हैं उनसे मैत्री करें। जो व्यक्ति मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा - इन चार बातों के अनुसार जीवन में व्यवहार करेगा, वह सुखी और शांत रहेगा।
संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।
गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।