जिस गुरु से हमें शिक्षा मिलती है, उसकी हम पूजा क्यों न करें। गुरु पूर्णिमा के दिन ही क्यों, पूरे जीवन का समर्पण क्यों नहीं? गुरु ज्ञान प्राप्ति के लिए सबसे सरल एवं उपयुक्त माध्यम हैं। वे हमारी सारी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। सच्चाई की राह दिखाते हैं। भगवान को पाने के लिए माध्यम बनते हैं।
शास्त्रों में आई गुरु महिमा ठीक होते हुए भी वर्तमान में प्रचार करने लायक नहीं है। इसलिए नहीं कि इसकी वजह यह है कि आजकल दंभी-पाखंडी लोग गुरु महिमा के सहारे अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, बल्कि इसलिए कि इसमें कलियुग भी सहायक है, क्योंकि कलियुग अधर्म का मित्र है।
वास्तव में गुरु महिमा प्रचार करने के लिए नहीं है, प्रत्युत धारण करने के लिए है। कोई गुरु खुद ही गुरु महिमा की बातें कहता है, गुरु महिमा की पुस्तकों का प्रचार करता है, तो इससे सिद्ध होता है कि उसके मन में गुरु बनने की इच्छा है। भीतर गुरु बनने की इच्छा है, तो वह दूसरों का भला कैसे हो सकता है?