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कुंडली के लिए जन्म को आधार माने या फिर गर्भाधान को, जाने क्या है सही

Fri, 23 Feb 2018 03:09 PM IST
कल्पवृक्ष,अमर उजाला
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कुंडली बनाने के लिए ग्रहों की स्थिति जन्म के समय से मानें या जातक के गर्भ में आने के समय से? सवाल नया नहीं है, फिर भी नए सिरे से उठा है। ज्योतिष के हिसाब से शुभ ग्रहयोगों में जन्म के लिए सिजेरियन प्रसव कराने का दौर भी चल पड़ा है। बंगलुरू में सितंबर के तीसरे सप्ताह में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में जर्मनी की लारा डंकन ने एक शोध पत्र पढ़ा। उसमें गर्भाधान के समय की कुंडली और जन्म समय की 135 अलग-अलग कुंडलियों का अध्ययन पेश किया गया। उस आधार पर किए गए भविष्य कथन की तुलना हुई और सम्मेलन में पहुंचे देश विदेश के ज्योतिषविदो ने सहमति जताई कि शुरुआती तौर पर जन्म के समय के साथ गर्भाधन के समय से भी कुंडली देखी जानी चाहिए, दिक्कत यह है कि गर्भाधान का समय जांचना मुश्किल है।
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विज्ञान कहता है कि बच्चा गर्भाधान के चार-छह सप्ताह बाद ही सीखना शुरू कर देता है। इतिहास पुराण के प्रसंगों पर नजर दौड़ाएं, तो अभिमन्यु जब मां के गर्भ में थे, तभी चक्रव्यूह में घुसना सीख गए थे। अर्जुन उस समय सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने की बात बता रहे थे। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, जब तीन माह का गर्भ हो जाता है, तब से बच्चे का निर्माण शुरू हो जाता है। बस यहीं से गर्भ पर ग्रहों का प्रभाव पड़ने लगता है। आज भी ग्रह नक्षत्रों के प्रभाव या कुंडली वगैरह का विचार कुछ समुदाय या लोगों के बीच नहीं किया जाता, लेकिन ग्रहणकाल में गर्भवती महिला को किसी तरह के धारदार घरेलू औजारों का प्रयोग जैसे सब्जी काटना, कैंची से कोई भी वस्तु काटना या कपड़ा सिलना आदि कार्य नहीं करने दिया जाता। जहां तक हो सके, उत्तम साहित्य पढ़ना चाहिए। प्रभु का ध्यान लगाना चहिए, ग्रहणकाल में बाहर नहीं निकलना चाहिए। 
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