फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

संसार का सामना करने के लिए श्रद्धा रखो: श्री श्री रवि शंकर

Tue, 12 Feb 2013 01:07 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
विज्ञापन
विज्ञापन
मानव जाति कठिन समय से गुज़र रही है। बढ़ते हुए तनाव के स्तर, आतंकवादी हमले, पर्यावरण प्रदूषण के साथ खतरे हर दिशा में छुपे हुए हैं। जब समय बुरा होने लगे, हमें अपनी श्रद्धा ताज़ा करनी चाहिए। श्रद्धा ही मनुष्य को कठिन समय से बाहर खींच लाती है। ये कई प्रकार से छुपी हुई हिम्मत और व्यक्ति का सामर्थ्य बाहर ले आती है।
विज्ञापन

 
कठिन समय से गुजरने के लिए जो दूसरी चीज़ चाहिए वो है शांत मन। जब मन शांत हो और तुम केन्द्रित हो, तब किसी भी परिस्थिति का सामना करना बहुत आसान हो जाता है। इसके लिए तुम्हें मन को वर्तमान क्षण में रहने की और तनाव को छोड़ने की थोड़ी सी शिक्षा देनी होगी। ये साँस पर ध्यान देने से हो सकता है।

भीतर की शांति को अपनी श्रद्धा के साथ जोड़ दो तब किसी भी परिस्थिति का सामना करने का फार्मूला तुम्हारे हाथ आ जाएगा। श्रद्धा होना मतलब इस बात को समझना कि, इश्वर का संरक्षण तुम्हारे साथ है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए इतनी श्रद्धा काफी है। फसल काटने के समय किसान एक बड़ी सी छलनी लेकर सारी फसल उसमें डाल देता है इसके बाद एक ऊँचे मचान पर खड़ा हो जाता है और छलनी को हिलाने लगता है। छिलके हवा में उड़कर कहीं खो जाते हैं अनाज ज़मीन पर गिरकर वहीं रह जाते हैं। अगर तुम्हारी श्रद्धा हिल जाती है और ऐसा बार-बार होता है तो ये बिलकुल उन छिलकों के सामान है।
विज्ञापन

 
जब मुश्किल परिस्थिति आती है तब अगर तुम्हारी श्रद्धा तुरंत ही हिल जाए तब तुम उसका सामना अपनी मुस्कान बरकरार रख कर नहीं कर सकोगे। अगर तुममें श्रद्धा नहीं है, तो तुम डर और अवसाद के शिकार हो जाओगे। तुम्हरे पास कोई सहारा नहीं होगा। अगर तुम्हारे पास श्रद्धा है तो तुम एक ठहराव पा सकोगे। और अगर तुम में श्रद्धा है तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। सब कुछ शांत हो जाएगा।
 
एक बार तुम जान जाओ कि तुम भाग्यवान हो तब सब असुरक्षा की भावनाएँ गायब हो जाएँगी। जीवन 80 प्रतिशत आनंद है और 20 प्रतिशत दुःख। पर हम उस 20 प्रतिशत को पकड़े रहते हैं और उसे 200 प्रतिशत बना देते हैं! ये जानबूझ कर नहीं किया जाता, बस हो जाता है। इस संसार में सब कुछ हमेशा सम्पूर्ण नहीं होता। यहाँ तक कि श्रेष्ठतम, महत्तम कार्य जो उत्कृष्ट इरादों से किया गया हो, उसमें भी कुछ त्रुटियाँ होंगी, बहुत स्वाभाविक है। 

लेकिन अगर तुम श्रद्धा में टिके हुए हो तो तुम जीवन में उन्नति करोगे और संसार में समभाव बनाए रखोगे। अगर तुम्हारी श्रद्धा गहरी है तो और सब चीज़ें अपने आप चलेंगीं। भौतिक दुनिया में श्रद्धा का महत्त्व और भी स्पष्ट हो गया है क्योंकि ये व्यक्ति को आत्मघाती प्रकृति से बचाता है और किसी चीज़ के कारण को प्रकट से परे देखने में मदद करता है। जब जीवन का आधार श्रद्धा हो, तब व्यक्ति बदले और नफ़रत की भावना में उलझे रहने की बजाय तत्वज्ञान का अनुसरण करता है।
 
प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के लिए प्रतिबद्धता ज़रूरी है। जीवन की सभी बातें, छोटी हों या बड़ी, प्रतिबद्धता पर ही चलतीं हैं, अक्सर हम ऐसा सोचते हैं कि पहले हमरे पास साधन हों उसके बाद हम वचनबद्ध होंगे। जितनी महान वचनबद्धता तुम लोगे उतने ही महान साधन तुम्हें प्रदान होंगे। ये प्रकृति का नियम है। जब तुम में कुछ अच्छा करने का उद्देश्य हो, ज़रूरी साधन जब जितनी ज़रुरत हो, बस आते जाते हैं। 
 
कठिन समय पर काबू पाने का दूसरा तरीका है दृष्टि को उतनी विशाल बनाना जिसमें सारी मनुष्य जाति शामिल हो जाए। जब हरेक व्यक्ति समाज को योगदान देने का इरादा रखे तो वह एक दिव्य समाज होगा। हमें अपनी व्यक्तिगत चेतना को विकसित करने की शिक्षा देनी चहिये कि वह 'मेरा क्या होगा' से ' कैसे सहयोग दूं' के ज्ञान की ओर उन्नत हो। 
 
अगर तुम अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए वचनबद्ध हो, तो तुम में उतनी क्षमता और शक्ति होगी। अगर तुम्हारी वचनबद्धता सम्प्रदाय के लिए है तो तुम्हें उतनी शक्ति मिलेगी। जो तुम्हारे पास है उसका तुम योग्य उपयोग करोगे तभी तुम्हें उससे ज़्यादा दिया जाएगा! ये प्रकृति का दूसरा नियम है। जब तुम अपने तुच्छ मन में अटके रहोगे तो प्रकृति क्यों तुम्हें ज़्यादा दे। सारे संसार की सेवा करने के लिए वचनबद्ध बनो, फिर तुम किसी भी कठिनाई का सामना कर सकोगे।  
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें