ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा की तिथि पर मध्यकाल के महान कवि और संत कबीरदास की जयंती मनाई जाती है। संत कबीर हिंदी साहित्य के ऐसे कवि थे जिन्होंने समाज में फैले आडंबरों को अपनी लेखनी के जरिए उस पर कुठाराघात किया था। संत कबीरदास आजीवन समाज में फैली बुराईयों और अंधविश्वास की निंदा किया करते थे। कबीरदास न सिर्फ एक संत थे बल्कि वे एक विचारक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जीवन जीने की कई सीख दी हैं। कबीरदास जी की बातें जीवन में सकारात्मकता लाती हैं। कबीर ने अपने दोहों में सुखी और सफल जीवन के सूत्र बताए हैं। कबीर जयंती के मौके पर आइए जानते हैं उनके कुछ दोहे और उनका मतलब
1- सबसे पहले अपने अंदर की कमियों को पहचानें
दोहा
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
अर्थ
- यह दोहा इस बात कि तरफ इशारा करता है कि जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झांक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
2- सच्चे प्रेम की ही तलाश करें
दोहा
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
अर्थ
- संत कबीर दास जी के अनुसार बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुंच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।
3- अच्छी बातें ग्रहण करें और बुरी का त्याग करें
दोहा
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।
अर्थ
- कबीर दास इस दोहे के जरिए यह बताते है कि इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे।
4- किसी को भी कम आंकने की गलती न करें
दोहा
तिनका कबहुं ना निन्दिये, जो पावन तर होय,
कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
अर्थ
- कबीर जी इस दोहे के माध्यम से एक छोटी से छोटी चीज का महत्व बताते हुए कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आंख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है।
5- संयम से बड़ी कोई दूसरी चीज नहीं
दोहा
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
अर्थ
- कबीरदास जी कहते है कि मन में धीरज रखने से सब कुछ प्राप्त होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।
6- मन को संभालने पर सब कुछ संभल जाता है
दोहा
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
अर्थ
कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।
7-
हमेशा ज्ञान का सम्मान करें, वह कोई भी हो
दोहा
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ
- कबीरदास जी ने किसी मनुष्य के अंदर ज्ञान के मोल बताते हुए बात कही कि सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का उसे ढकने वाले खोल का।
8- बिना कोशिश के कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता
दोहा
जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।
अर्थ
- कबीरदास जी ने इस दोहे के जरिए कर्म करने की सलाह दी है। उनके अनुसार जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।
9- हमेशा संयमित होकर व्यवहार करें
दोहा
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ
- कबीरदास जी कहते है कि किसी का न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।