कोई कह सकता है कि हम विश्व-मैत्री की बातें कर रहे हैं, पर आज तो व्यक्ति-व्यक्ति में विरोध की भावना व्याप्त है। तब फिर विश्व का प्रश्न ही कैसा? इस संदर्भ में मैं कहना चाहूंगा कि विरोध की भावना दो नहीं, एक ही होती है। चाहे वह छोटे क्षेत्र में हों, चाहे बड़े क्षेत्र में। विरोधी-भावना व्यक्ति की अपनी आत्मा की ही उपज होती है। अतः उसे अन्मूलित करने का मार्ग है कि लोग ‘मैत्री’ के मूल को समझें।
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मैत्री दिवस’ जिस भावना का प्रतीक है, उसमें कोई व्यक्ति भी दूसरे व्यक्ति के प्रति विरोध नहीं रखेगा। इसका पहला कदम होगा-अपनी त्रुटियों के लिए व्यक्ति स्वयं दूसरों से क्षमायाचना करे। भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा, जो क्षमा मांगने पर क्षमा नहीं देगा। इसीलिए यह आवश्यक है कि विश्व भर में एक दिन ऐसा मनाया जाए, जिसके माध्यम से संसार के सभी लोग मैत्री के महत्व को समझ सकें।
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मैत्री-दिवस किसी एक समाज या एक देश के लिए नहीं हैं। हमें इसे अखिल विश्व के स्तर पर लाना चाहिए। संसार महायुद्धों को देख चुका है। शांति-संधियां भी होती हैं, पर जब स्वार्थ आपस में टकराते हैं, तो मैत्री की भावना और संधियां किनारा ले लेती हैं। ऐसे समय में हमारा कर्तव्य है कि हम युद्धग्रस्त मानव समुदाय को मैत्री की भावना के प्रति आमुख करें। इसी दृष्टि से दिल्ली में ‘मैत्री दिवस’ का प्रथम आयोजन किया गया था। फिर यह आयोजन अनेक स्थानों पर मनाया गया।
इसका लक्ष्य था कि मानव को एक स्वार्थमुक्त मैत्री की भावना मिले। जब सभी लोग शांति की पुकार करते हैं, तो क्यों कुछ राष्ट्र नेता अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए अशांति को बुलावा देते हैं। दरअसल युद्ध की भावना राष्ट्र से नहीं, व्यक्ति के मस्तिष्क से निकलती है। प्रहार मूल पर ही हो, ताकि युद्ध की भावना ही न पनपे। आज अशांत मनुष्य शांति की खोज में है। राजनीति की मृग-मरीचिका में उसे पद-लिप्सा, आत्म-प्रशंसा पर-निंदा की चकाचौंध ही मिली है।