ऐसे माता-पिता की कहानी, जिन्होंने अपनी बेटी के इलाज के दौरान वह अनुभव हासिल किया, जिसने उन्हें संवेदनशील बना दिया।
जब जिया महज छह साल की थी, तभी से उसके माता-पिता ने एक अनोखे उत्सव की शुरुआत की थी। यह एक ऐसा उत्सव था, जो जिया और उसके दोस्तों को जिंदगी को देखने का एक नया नजरिया देता था। जिया अपने मां-बाप की इकलौती बेटी थी। जब जिया का जन्म हुआ, तब डॉक्टरों ने बताया कि उसकी आंखें विकसित नहीं हो पाईं, जिसकी वजह से वह कभी देख नहीं पाएगी। जिया के माता-पिता ने जिया के इलाज में लाखों रुपये खर्च कर दिए, लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली।
वे रोज अलग-अलग अस्पतालों के चक्कर काटते थे। इस बीच उन्हें कई ऐसे लोग भी मिले, जो नेत्रहीन थे। जिया के माता-पिता को तब इसका एहसास हुआ कि नेत्रहीन लोगों की जिंदगी कितनी कठिन होती है। उन्हें इसका भी एहसास हुआ कि आम लोग इन नेत्रहीनों की पीड़ा के बारे में थोड़ा भी नहीं सोचते। जिया के माता-पिता किसी भी तरह अपनी बेटी को उस अंधेरे से निकालना चाहते थे। अंततः उन्हें एक डॉक्टर मिल गया, जिसके पास जिया का इलाज था। जिया के माता-पिता ने उसका इलाज करवाया और जिया देखने भी लगी।
लेकिन जिया के माता-पिता को उसके इलाज के दौरान का अनुभव यह सिखा गया कि जिंदगी बहुत अनमोल है, पर अगर इंसान एक दूसरे के दर्द बांट सके, तो जिंदगी के मायने और बढ़ जाते हैं। जिया के माता-पिता हर साल कम से कम दस नेत्रहीन लोगों के इलाज में मदद करते और हर साल जिया के जन्मदिन पर यह उत्सव मनाते थे, जिसमें परिवार के हर सदस्य को एक दिन के लिए यह कल्पना करनी होती थी कि उसके शरीर का कोई एक अंग नहीं है। एक दिन के इस अनुभव से जिया के परिवार के सदस्य एक दूसरे की मदद करने की अहमियत और दूसरों की तकलीफों-संवेदनाओं को आसानी से समझ पाते थे।