मां की कहानी, जिनके गुस्से से डरकर प्रज जीवन में एक सफल आदमी बन पाया।
प्रज टेक्नोलॉजीज की दसवीं सालगिरह थी। पिछले दस साल में कंपनी किराये के एक छोटे-से कमरे से लेकर गुरुग्राम के महंगे इलाके में एक बड़ी इमारत तक पहुंच गई थी। प्रज ने यह कंपनी दो लोगों से शुरू की थी और आज कंपनी में बीस हजार लोग काम करते थे। कंपनी की दसवीं सालगिरह पर प्रज की मां भी उसके ऑफिस में आईं थीं। इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रज ने कहा, मैं मां से बेहद प्यार करता था। मेरी मां लोगों के घरों में बरतन मांजकर घर का खर्च चलाती थीं।
मैं भी स्कूल के बाद कभी किसी होटल में बर्तन धो देता था, तो कभी किसी के घर में सामान पहुंचाने का काम कर दिया करता था। एक बार की बात है। मैं बारह साल का था। मां का जन्मदिन आ रहा था। मैं अपनी मां को नई साड़ी दिलाना चाहता था, क्योंकि उनकी साड़ी पुरानी और बदरंग हो चुकी थी। मैंने कई लोगों से पैसे उधार लेकर हजार रुपये इकट्ठा किए थे। पर जब मैं अपनी मां के लिए साड़ी लेकर आया, तो वह बहुत नाराज हुईं। वह कहने लगीं, तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर पाओगे।
तुम्हारा पूरा जीवन ऐसे ही कर्ज में बीत जाएगा। उन्होंने वह साड़ी वापस कर दी। उसके बाद कई दिनों तक न मैं मां से कुछ बोला, न मां ने मुझसे कोई बात की। मैं स्कूल जाता रहा और वहां से निकलकर छोटे-मोटे काम करता रहा। आज उस बात को लगभग तीस साल बीत चुके हैं। मां , मैं आज आपको बताना चाहता हूं कि उस दिन मैं आपके लिए जो साड़ी लाया था, उसके बीच में एक पत्र भी था, जिसमें लिखा था कि मुझे पढ़ाई में कोई रुचि नहीं। मैं स्कूल नहीं जाऊंगा क्योंकि मैं बिना पढ़ाई के भी कमा सकता हूं। पर आपके डर से मुझे यह बात बोलने की कभी हिम्मत ही नहीं हुई। अगर उस दिन आपने मेरी साड़ी और मेरा पत्र स्वीकार कर लिया होता, तो मैं आज यह दिन नहीं देख पाता।