निराश सिड की कहानी, जिसे एक मृत छात्र की मां ने जिंदगी की कीमत का एहसास कराया।
करीब आठ महीने पहले सिड एक भीषण सड़क दुर्घटना की चपेट में आ गया था। सिड का बच जाना सचमुच एक करिश्मा ही था। पर सिड के लिए बचा हुआ जीवन अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। सिड का जीवन बचाने के लिए डॉक्टरों को उसके पैर काटने पड़ गए थे। कुछ महीने तो उसे खाना और पानी भी नलियों के द्वारा ही दिया जाता था। लगभग पांच महीने
बाद जाकर पहली बार उसे व्हीलचेयर पर बिठाया गया। दुर्घटना से पहले सिड एक तैराक था, लेकिन अब उसका चलना-फिरना भी दूभर हो गया था। सिड के लिए उसका जीवित बच
जाना एक सदमा जैसा था। इस हाल में खुद को पाकर उसके अंदर जीने की कोई इच्छा नहीं बची थी।
डॉक्टर और सभी परिवार वाले उसको ठीक होता देखना चाहते थे, लेकिन सिड के अंदर वापस जीने की कोई इच्छा नहीं थी। यही वजह थी कि उसकी सेहत पर इलाज का ज्यादा फर्क भी नहीं पड़ रहा था। सिड हर वक्त अपने आप को और अपनी किस्मत को कोसता रहता। फिर एक दिन एक और दुर्घटना का शिकार छात्र अस्पताल लाया गया। दुर्भाग्य से उसे बचाया नहीं जा पाया। उसके मां-बाप जब उसका शरीर लेने अस्पताल पहुंचे, तो सिड व्हीलचेयर पर बैठा सब देख रहा था।
सिड ने उसके मां-बाप से कहा, अच्छा हुआ वह नहीं बचा, नहीं तो उसकी भी हालत मेरी जैसी होती। न वह जी पाता, न मर पाता। उस लड़के की मां ने सिड को थप्पड़ मारते हुए कहा, मेरा बेटा तो चला गया, पर अगर वह जिंदा होता, तो तुम्हारी तरह जिंदगी की बेकद्री नहीं करता। ईश्वर का धन्यवाद न करके तुम अपनी जिंदगी के ही मायने कम कर रहे हो। मुझे तरस आता है तुम्हारे और उन लोगों के ऊपर, जो अब भी तुमसे उम्मीद लगाकर बैठे हैं। जिंदगी की कीमत समझनी है, तो उनसे समझो, जिनके पास वह भी नहीं, जो तुम्हारे पास है।