तीसरे दोस्त की कहानी, जिसने प्यास मिटाने के मामले में मित्रों की तुलना में व्यावहारिकता का परिचय दिया।
एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए तीन दोस्त हिमालय पर जा पहुंचे। उनमें से एक बड़े अमेरिकी उद्योगपति का बेटा था। दूसरा एक बड़े संत का पुत्र था। जबकि तीसरा एक साधारण मजदूर था, जिसके पास न दौलत थी, न शोहरत। वहां पहुंचकर तीनों मित्रों को बहुत प्यास लगी। पर उनके पास मात्र आधा गिलास पानी था। अमीर दोस्त ने कहा, इस पानी पर सिर्फ मेरा हक है, क्योंकि मैं उतनी दूर से यहां आया हूं। मेरे पिता के पास इसे किसी भी कीमत पर खरीदने की क्षमता है।
संत का बेटा बोला, यह पानी सिर्फ मेरे लिए है, क्योंकि मेरे पिता करोड़ों लोगों के जीवन का उद्धार करते हैं। तीनों मित्रों ने सोच-विचार के बाद तय किया कि अभी कोई पानी नहीं पिएगा और सब सो जाएंगे। ईश्वर जिसके सपने में आकर पानी पीने का संकेत देंगे, वही पानी पिएगा। तीनों सोने चले गए। पर तीसरे दोस्त को नींद ही नहीं आई। आधी रात को बाकी दोनों दोस्त उठे और एक-दूसरे को अपना-अपना सपना सुनाने लगे। पहले दोस्त ने कहा, मैं सपने में एक अनजानी जगह पहुंचा। वहां बहुत शांति थी और वहीं मुझे ईश्वर मिले। उन्होंने मुझे कहा कि तुमने जीवन में सदा त्याग ही किया है, इसलिए यह पानी तुम्हें ही पीना चाहिए।
तभी दूसरे दोस्त ने कहा, मैंने सपने में देखा कि मैं महात्मा बन गया हूं और मेरी मुलाकात ईश्वर से होती है। वह मुझे कहते हैं कि लंबे समय तक कठोर तप करने के कारण पानी पर पहला हक तुम्हारा है। दोनों दोस्त अपनी-अपनी बात कहकर तीसरे दोस्त की तरफ पलटे। तीसरा दोस्त काफी देर तक दोनों को देखता रहा, फिर बोला, मुझे नींद ही नहीं आई। नींद नहीं आई ,तो सपना कैसे आता? आप दोनों तो ईश्वर से बातें कर रहे थे। पर ईश्वर ने मुझे प्यासा मरने से बचाने के लिए सोने ही नहीं दिया। इसलिए मैं सारा पानी पी गया।