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जो सब कुछ जानते हुए भी दूसरों को जाल में फंसने दे, असली दोषी वही है

Thu, 05 Apr 2018 01:00 AM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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मनीष की कहानी, जिसे ठगे जाने पर एहसास हुआ कि जिस जमींदार को वह हितैषी समझता था, वह धूर्त आदमी है।

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प्रोफेसर कदम ने अपनी क्लास एक कहानी से शुरू की। एक गांव में एक किसान था, जिसके तीन बेटे थे, रवि, सोहन और मनीष। किसान के पास बहुत जमीन थी। एक जमींदार बड़े दिनों से उस पर नजरें जमाए हुए था। किसान की मृत्यु के बाद जमींदार को वह जमीन हथियाने की एक तरकीब सूझी। वह मनीष के पास जाकर बोला, कैसे हो? कितने दिनों बाद तुमसे मुलाकात हुई? मनीष ने चौंकते हुए पूछा, क्या आप मुझे जानते हैं? जमींदार बोला, मैं तुम्हारा चाचा हूं और जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा भी है।

मनीष यह सुन बेहद प्रभावित हो गया। धीरे-धीरे जमींदार के साथ उसकी बातचीत बढ़ने लगी और वह खुद को जमींदार समझने लगा। दोनों भाइयों ने मनीष को समझाने की कोशिश की कि जमींदार अच्छा आदमी नहीं है, पर मनीष को लगा कि उसके भाई उससे जलते हैं, इसलिए ऐसा कह रहे हैं। धीरे-धीरे अपने भाइयों से मनीष का झगड़ा बढ़ने लगा। एक दिन जमींदार ने मनीष से कहा, हमारे परिवार का सदस्य होने के नाते मैं तुम्हें विदेश पढ़ने भेजना चाहता हं। तुम्हारी पढ़ाई और रहने-खाने का इंतजाम तो हो गया है, बस आने-जाने के लिए कुछ और पैसे चाहिए, जो तुम चाहो, तो अपनी जमीन मुझे बेचकर ले सकते हो।
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मनीष ने सोचा, चाचा मेरा कितना ख्याल रखते हैं। एक यही मेरे हितैषी हैं। यह सोचकर मनीष ने अपनी जमीन कौड़ियों के भाव चाचा को बेच दी। बस फिर क्या था, जमीन मिलते ही जमींदार का बर्ताव बदल गया। मनीष को समझ में आ गया कि उसे विदेश भेजने की बात झूठ थी, उसे ठगा गया। कहानी सुनाकर प्रोफेसर ने छात्रों से पूछा, बताओ कि इस कहानी में दोषी कौन है? सभी छात्रों ने एक सुर में कहा, सर जमींदार और मनीष दोषी हैं। प्रोफेसर बोले, यह सही नहीं। जमींदार तो सिर्फ अपना मुनाफा देख रहा था, उसका तो यह काम ही था। और मनीष तो हमेशा से बेवकूफ ही था। असली दोषी हैं सोहन और रवि, जो सब जानकर भी चुपचाप रहे।

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