इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मनेंद्र नौकरी ढूंढ रहा था। लेकिन मंदी के कारण नौकरी नहीं मिल पा रही थी। उसने कंप्यूटर बेचने का काम शुरू किया। वह थोक बाजार से कंप्यूटर के पुर्जे इकट्ठा करता और उन्हें एसेम्बल कर बेच देता।
फिर उसे मालूम पड़ा कि लोगों को सफेद कलर का कंप्यूटर अच्छा नहीं लगता। नतीजतन वह थोक में कंप्यूटर मंगाता, उन्हें अपने मनचाहे रंग देता, और उन्हें बढ़िया दामों में बेचकर पैसे कमाता। कुछ दिनों में उसका काम जोर-शोर से चलने लगा। कुछ साल में उसने कंप्यूटर तैयार करने की अपनी कंपनी बना ली।
वह युवा छात्रों से साझेदारी करता, उनकी रचनात्मक सोच से नए-नए प्रयोग करता और उन छात्रों को भी खूब मुनाफा पहुंचाता। मनेंद्र के कंप्यूटर पूरे शहर में मशहूर हो गए। उसका काम बढ़ा, तो उसने कई लोगों को काम पर रख लिया और ढेर सारे पार्टनर भी बना लिए। पर कुछ समय बाद बाजार में रंगीन कंप्यूटरों की भरमार हो गई।
अब लोग ब्रांडेड कंप्यूटर ही खरीदने लगे। मनेंद्र का व्यापार धीरे-धीरे नीचे जाने लगा। मनेंद्र तो बाजार में आए बदलाव को परख रहा था, पर उसके पार्टनरों को यह स्थिति अखर रही थी। एक दिन मनेंद्र को बिना बताए उसके पार्टनरों ने मीटिंग रखी और उसमें फैसला किया कि जो कुछ भी हो रहा है, वह मनेंद्र की वजह से हो रहा है।
अतः उन्हें कंपनी की बागडोर संभालनी चाहिए और मनेंद्र को हटा देना चाहिए। अगले दिन मनेंद्र को जब यह बात पता चली, तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। जिन लोगों को उसने खुद कंपनी में रखा, उन्होंने ही मिलकर मनेंद्र को कंपनी से बाहर कर दिया।
लेकिन मनेंद्र ने समय गंवाए बगैर दूसरा काम शुरू कर दिया। इस बार उसने सॉफ्टवेयर बनाने का काम शुरू किया। कुछ वर्षों में मनेंद्र की कंपनी एक बार फिर बुलंदी पर पहुंच गई, लेकिन उसकी पुरानी कंपनी, जिसे उसके पार्टनर चला रहे थे, बदकिस्मती से बंद हो गई।
प्रतिभावान और परिश्रमी का सफल होना तय है, इल्जाम लगाने वाले विफल होते हैं।