मेरा जन्म फ्रांस के एक गरीब परिवार में हुआ। हमारा कोई स्थायी घर नहीं था। मेरी मां एक चैरेटी अस्पताल में कपड़े धोने का काम करती थी और मेरे पिता सड़क पर सामान बेचा करते थे। मैं जब बच्ची ही थी, तभी मेरी मां का देहांत हो गया और मेरे पिता ने मुझे एक आश्रय में भेज दिया।
मेरी जिंदगी सुखमय नहीं थी, इसलिए मैंने उसे स्वयं अपने ढंग से गढ़ा। अबेजिन आश्रय में छह वर्ष रहने के दौरान मैंने सिलाई सीखी और सिलाई का काम पाने में सक्षम हो गई। जब सिलाई का काम नहीं होता था, तो मैं कैबरे में नाच-गान करती थी। वहीं मुझे कोको उपनाम मिला। बीस वर्ष की उम्र में मुझे यह एहसास हो गया कि जीवन में पैसा महत्वपूर्ण चीज है। 1908 में एक मित्र ने मुझे एक दुकान खोलने की सलाह दी और वित्तीय मदद करने का वायदा किया। फिर मैंने टोपी बनानी और बेचनी शुरू की। 1913 में मैंने अपना बुटीक खोला और महिलाओं के लिए कपड़े बनाने शुरू कर दिया। इसमें मेरी बहनों और करीबी रिश्तेदारों ने भी सहायता की। मैं खुद ही ड्रेस डिजाइन करने लगी और शीघ्र ही फैशन डिजाइनर के रूप में ख्याति हासिल की।
मैंने महिलाओं के लिए ऐसी ड्रेस डिजाइन की, जिसके बारे में कल्पना भी नहीं की जाती थी-ट्रैकसूट। हाउस ऑफ चैनल द्वारा उत्पादित परिधान सरल, व्यावहारिक और सुरुचिपूर्ण थे। 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ गया और फ्रांस में प्लेग फैल गया। लेकिन मैंने अपना काम जारी रखा और कपड़ों की नई मांगें पेश कीं और परिधान से संबंधित नए विचार पैदा किए। मैंने अपने संपर्क के लोगों से काफी चीजें सीखीं। मेरे परिधान एवं मेरी शैली से महिलाएं इतनी प्रभावित थीं कि कई महिलाओं ने मेरे आह्वान पर अपने बाल काट दिए और ले फिटिंग स्वेटर, ब्लेजर, सरल बुनाई स्कर्ट, ट्रेंचकोट और मेरे ‘छोटे काले कपड़े’ के लिए अपने कॉर्सेट को त्याग दिया।
एक फैशन डिजाइनर के रूप में अपने वर्षों के करियर में मैंने कई नौतियों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी और लगातार अपने जुनून के साथ काम में लगी रही। हां, मैंने सफलता के लिए अपने सामाजिक संपर्कों का इस्तेमाल जरूर किया, लेकिन हमेशा जोखिम उठाती रही। मेरा मानना है कि लोगों को दीवार पीटने के बजाय उसे दरवाजे के रूप में बदलने की कोशिश करनी चाहिए।
लोगों को दीवार पीटने के बजाय उसे दरवाजे के रूप में बदलने की कोशिश करनी चाहिए।