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गंगा से लेकर गायत्री तक इन पांच की होती है पूजा, क्यों?

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गंगा, गऊ, गोपी, गीता और गायत्री सनातन संस्कृति के आधार हैं।  इन पांचों की पूजा होती। गंगा हिमालय से निकली और संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पवित्र करती है। वह कोई मामूली नदी नहीं है। उसमें स्नान से शरीर तो पवित्र होता ही है, उस के साथ पाप कर्मों  हो जाता है। लेकिन दुख  है कि इसकी महत्ता धीरे धीरे लुप्त होती गई। गंगा का प्रदूषण दिनोंदिन उसके लुप्त होने का खतरा उत्पन्न कर है।
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दूसरे मानदंड या आधार गाय को हम मां कहते हैं उसकी पूजा करते हैं। वह हमारी कृषि का आधार है, लेकिन उसका यह पक्ष अलग चर्चा का विषय है। अभी सिर्फ यही कि शास्त्रों के अनुसारउसके शरीर में अस्सी करोड़ देवी देवताओं का वास है। हर धार्मिक अनुष्ठान स्मरण और आराधन किया जाता है। लेकिन जीवन के हर क्षेत्र में उसकी उपेक्षा हो रही है।

गोपी यानी नारी। वह घर परिवार और समाज में लक्ष्मी का प्रतीक है। जाहिर है जहां उसका अपमान होता हो, उसे सताया जाता हो, वहां लक्ष्मी अर्थात समृद्धि नहीं रहती। हो तो भी रूठ कर चली जाती है। वह समाज कभी फल फूल नहीं सकता नारी को तो हमारे यहां शक्ति, दुर्गा कहा गया है। इसी की बदौलत घर फलते फूलते हैं।
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गोप और गऊ की पूजा का आधार

गीता शास्त्रों का सार है गीता किसी का लिखा हुआ शास्त्र नहीं है, बल्कि कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण द्वारा संसार को के लोगों को दिया गया संदेश है कि जीवन में क्या करना है और क्या नहीं करना है? क्या उचित है और क्या अनुचित है? विश्वास करना चाहिए या नहीं करना चाहिए।

आज भटकाव का सबसे बड़ा कारण यह है कि हम एक दूसरे पर विश्वास नहीं करते। विश्वास में कहीं न कहीं कमी आई है। उसी के साथ-साथ श्रीकृष्ण की वाणी यानी गीता में सुझाए मार्ग और उसमें किए मार्गदर्शन पर अमल नहीं करते। इसलिए जीवन में संशय बना रहता है। उसमें कर्म की बात कही गयी है।

उसमें सुझाए मार्ग पर तो चलो, उस पर अमल तो करो। लेकिन होता यह है कि इंसान सद्कर्म तो करता नहीं और फल की इच्छा रखता है। इस लिए भटकता है। भगवान ने यही कहा कि कर्म के फल की इच्छा मत करो। जीवन में ध्यान रखना कोई भी कर्म फल दिए बिना नहीं रह सकता। यह इंसान पर है निर्भर है कि वह कैसे कर्म करता है। सत्य अथवा पाप कर्म। जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा।

गंगा को स्वच्छ रखो, उसे प्रदूषित मत करो, गऊ की मां की दृष्टि से सेवा करो। गोपी यानी नारी का सम्मान करो। गीता को जीवन का आधार मान उसकी एक एक बात पर अमल करो और गायत्री का जाप इसी में जीवन का साफल्य है और आनंद है।
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तो यहां द‌िखेंगे भगवान

जहां तक भगवान के दर्शन का सवाल है? फिर वह तो गरीब की झोपड़ी में होंगे। वहां जाओ उनकी सेवा करो, बांटकर खाओ। यज्ञ और दान करो। हर नर में नारायण का वास है।

यह मानकर एक दूसरे से प्रेम करो। दीनहीनों की मदद करो। फिर देखो तुम्हारा जीवन आनंद से भर जाएगा। वही व्यक्ति साहूकार है जो अपनी कमाई का एक भाग दीन हीन और गरीबों की भलाई और उनके उत्थान पर खर्च करता है।

दान और यज्ञ करना कोई उपकार नहीं है। यह तो हमारी संस्कृति का अंग है। यज्ञ का मतलब केवल अग्निकुंड में हवन सामग्री की आहुति नहीं बल्कि जरूरतमंदों में अपनी नेक कमाई का एक भाग वितरित करना यज्ञ है। एक बात ध्यान रखें कि जमीन में नीम का बीज यानि निबौली बोएगे तो नीम का ही पेड़ होगा।

आम की गुठली से स्वादिष्ट आम का पेड़ होगा। इसी प्रकार यह जीवन भी है, जैसा करोगे, वैसा फल तुम्हे भोगना पड़ेगा उससे तुम वंचित नहीं रह सकता। इस लिए शुभ कर्म करो दीनहीनों को गले लगाओं। उसी में जीवन साफल्य है।
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