मंजीत की मनोविज्ञान की क्लास थी। प्रोफेसर सिंह आज कुछ अलग ही अंदाज में क्लास लेने आए। क्लास में घुसते ही वह बोले, आज मैंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय की एक अनोखी रिसर्च के बारे में पढ़ा। वह रिसर्च सौ साल से चल रही है और अभी भी खत्म नहीं हुई है। क्या आप लोग बता सकते हैं कि ऐसी रिसर्च का विषय क्या हो सकता है? सारे छात्र सोचने लगे। प्रोफेसर बोले, रिसर्च का विषय था कि दुनिया में लोगों को मरने से पहले सबसे बड़ी खुशी किस बात से होती है। क्या वह पैसा होता है? या नाम, इज्जत-शोहरत? या फिर बड़ा बैंक बैलेंस? आप भी सोचिए। मंजीत बोला, सर मुझे पता है।
प्रोफेसर ने मंजीत से पूछा, क्या? मंजीत बोला, सर, लोगों को सबसे ज्यादा खुशी मिलती है अच्छे रिश्तों से। क्लास के सभी बच्चे हंसने लगे। प्रोफेसर भी मुस्कुराए, फिर बोले, सच में यह लगता तो बेहद मजाकिया है, लेकिन सच यही है। रिसर्च से यही पता चला है कि पूरा जीवन बिताने के बाद, जो बात हमें सबसे ज्यादा खुशी और संतुष्टि देती है वह है हमारे रिश्ते। एक बच्चे ने पूछा, लेकिन सर, ऐसा कैसे मुमकिन है? जितनी तरह के लोग, उतनी तरह की सोच, और दो लोगों की सोच का आपस में मिलना तो बहुत मुश्किल है। रिश्तों में तो ऊंच-नीच होती ही रहती है।
प्रोफेसर बोले, तुमने बिल्कुल ठीक कहा, लेकिन तुम्हे क्या लगता है कि तुम बहुत अक्लमंद हो। हम सब यही मानकर बैठे रहते हैं कि हम ही अक्लमंद हैं। इसीलिए हमारे विचारों में मतभेद होते हैं। हम एक-दूसरे पर अपना नजरिया थोपने लगते हैं। कुछ पलों के लिए अगर हम यह मान लें कि हम पहले दूसरों का नजरिया समझेंगे, परखेंगे, फिर अपना नजरिया आजमाएंगे, तो सारे मन-मुटाव खत्म हो सकते हैं। मंजीत ने पूछा, लेकिन सर, अगर दूसरा यह बात फिर भी न समझे तो? प्रोफेसर बोले, जब यह मान लिया कि दोनों एक ही हैं, तो दूसरा रहा ही कहां! यही तो हमारी परीक्षा है।