नमिता की कहानी, जिसे एक ऑटो ड्राइवर ने सीख दी कि अपने पास जो भी है उसे दूसरों में बांटना चाहिए।
नमिता अपने ऑफिस से बाहर निकल ही रही थी कि उसे हेमलता मिल गई। हेमलता बोली, दीदी, घर चल पड़ीं क्या? क्या खास करने जा रही हो आज? नमिता बस मुस्कराई और चुपचाप बाहर निकल गई। वह मन ही मन सोचने लगी, काश, मैं भी कोई जवाब दे सकती। कह सकती कि हां, मेरी शाम बहुत खुशनुमा और रंगीन होने वाली है। बाहर निकलते-निकलते नमिता ने सोचा, चलो आज बस की जगह ऑटो से ही घर चलते हैं। ऑफिस के ठीक सामने से ही नमिता को ऑटो मिल गया।
नमिता चुपचाप ऑटो में बैठी और ऑटो चल पड़ा। ड्राइवर ने देखा, नमिता बहुत मायूस-सी लग रही थी। उसने कहा, मैडम, क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूं। कुछ देर बाद नमिता बोली, भइया, आप कितने वर्षों से ऑटो चला रहे हो? ड्राइवर बोला, मैडम, मैं जब अट्ठारह साल का था, तभी से यह ऑटो चलाता हूं। अब तो मैंने साल गिनने छोड़ ही दिए हैं। नमिता ने ऑटो ड्राइवर को फिर से गौर से देखा, उसने पाया कि वह काफी बुजुर्ग था। नमिता ने पूछा, रोज-रोज एक ही काम करके आप बोर नहीं हो जाते। ड्राइवर बोला, रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं, अगर दिल में कुछ कर दिखाने की चाह हो। नमिता ने पूछा, मतलब? ड्राइवर बोला, मैडम, ऑटो चलाना तो बस मेरा पेशा है।
मेरा शौक पढ़ाना है। मैं रोज शाम को ठीक छह बजे वापस अपने चॉल पहुंच जाता हूं। वहां पांच साल से लेकर पचास साल तक के छात्र मेरा इंतजार कर रहे होते हैं। ऐसा पिछले बीस वर्षों से लगातार हो रहा है। पर जब उनमें से एक भी छात्र कुछ कर दिखाता है, तो लगता है जैसे मेरा पूरा जीवन सार्थक हो गया। जरूरी नहीं कि जीवन आपको सबकुछ दे। पर आपके पास जो है, बस उतना ही भर बांटते चलो, जिंदगी से बोरियत गायब हो जाएगी।