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मैं चाहता हूं कि हर बच्चा शरारती हो: श्री श्री रविशंकर

Mon, 29 Oct 2012 01:53 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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मुझे देखिये मेरा बचपन अभी तक खत्म नहीं हुआ। वो अभी भी चल रहा है। हां फर्क सिर्फ इतना है कि बचकानी हरकतें अब नहीं करता। मैं जैसा पहले था वैसा आज भी हूं। बस अंतर ये है कि तब शरीर भी बच्चों जैसा था और आज सिर्फ मन बचपन जैसा है। मैं तो आज भी नटखट हूं और मैं चाहता हूं कि हर बच्चा शरारती हो और बड़ों को जितना सता सके उतना सताएं।
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लेकिन आज बच्चों का अंदाज बदल चुका है। वो शरारत करना भूल रहे हैं या उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आज बच्चे जब तनाव में होते हैं तो दूसरों को तंग करते हैं। हम तो खेलकूद कर दूसरों को तंग करते थे। आपको भी ऐसा ही करना चाहिए लेकिन ध्यान रहे कि आपकी किसी हरकत से दूसरों को नुकसान न हो।

कन्नड़ में एक कहावत है कि बिल्ली का खेल, चूहे का प्राण-संकट। ऐसा न हो। जीवन का आनंद अभिव्यक्ति है। अगर हम ये समझ सकें तो सारे तनावों से मुक्ति पा सकेंगे। मैं बचपने को इतना महत्व देता हूं क्योंकि मैं समझता हूं कि बचपने में की गयी अभिव्यक्ति निश्छल होती है। उसमें कोई राग-द्वेष नहीं होता है। ऐसी अभिव्यक्ति में अगर आप दूसरों को सताना भी चाहते हैं तो उसमें भी सिर्फ शरारत मात्र होती है दूसरों के अहित की भावना बिल्कुल नहीं।
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बचपन जितना जरूरी है उतना ही परंपराओं का भी महत्व है। आज कल लोग अपनी परंपराओं को छोड़कर दूसरों की परंपराओं में अधिक रूचि लेने लगते हैं। जबकि ऐसा नहीं करना चाहिए। मैं एक तमिल परिवार में पैदा हुआ। तब से लेकर अब तक मेरा जीवन काफी परिवर्तित हुआ है। मेरा परिवेश भी बदला है लेकिन मैने कभी भी अपनी परंपराओं को नहीं छोड़ा क्योंकि मैंने कभी इसे छोड़ने की ज़रूरत नहीं समझी।

यहाँ प्रत्येक परंपरा की अपनी खूबी और सुंदरता है। बस ये देखना पड़ेगा कि परंपरा में कट्टरपंथ के तत्व न आने पाएं। या कहें कि परंपरा का ये दावा न हो कि हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं। हमें इससे बचना है। अपनी परंपरा को खुद से जोड़ कर रखने से हम भारत की विरासत को सहेज कर रख सकेंगे। इसके साथ ही हमें अपने दृष्टिकोण को भी बड़ा बनाए रखना होगा।

श्री श्री रविशंकर
जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए थे और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की। इसके बाद श्री श्री ने दुनिया भर में सुदर्शन क्रिया के विस्तार के लिए आर्ट ऑफ लिविंग संगठन की स्थापना की।
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