कोई भी चीज अथवा स्थिति जो हमारे विरोध में हो और हमारी सहनशक्ति से पार जा रही हो, तो उस स्थिति को रोकने के लिए प्रकृति हमारे अन्दर एक विस्फोट पैदा करती है और वही विस्फोट क्रोध बनकर बाहर प्रकट होता है।
क्रोध के विषय में यह भी कहा गया है कि ‘क्रोधे वैवस्वतो राजा’ अर्थात् क्रोध यमराज का रूप है और क्रोध महाराक्षस भी है। जब भी क्रोध प्रकट होता है, तो इंसान की बुद्घि भी क्षीण हो जाती है। स्मरण शक्ति समाप्त हो जाती है और सोचने-समझने की शक्ति उसमें रहती ही नहीं है।
जब गुस्सा आता है, तो श्वासों की गति तेज हो जाती है, पूरा शरीर कांपने लगता है, नथुने फूल जाते हैं, भृकुटी तन जाती है, मुट्ठियां कस जाती हैं, अपने आप दांत पिसना प्रारम्भ हो जाता हैं, मुस्कराहट छिन जाती है, तो उस समय क्रोध यमराज का रूप लेकर सामने आता है।
जब इंसान की मुस्कराहट समाप्त हो जाती है, तब क्रोध उत्पन्न होता है। जब तक मुस्कराते रहोगे, तब तक क्रोध आपसे दूर रहेगा और मुस्कराना बंद हुआ कि क्रोध आप पर हावी होने लगेगा। और मुस्कराने की कोशिश भी करना चाहे, तो भी उसकी मुस्कराहट में राक्षस दिखाई देता है, क्योंकि अन्दर क्रोध रूपी राक्षस बैठा है।
क्रोध प्रकट होने पर व्यक्ति अपने आप से बाहर हो जाता है, अपने उपर काबू नहीं रख पाता। लेकिन इंसान को अपने अन्दर के क्रोध का सही प्रयोग करना भी जरूरी है। अपने दुर्गुणों पर क्रोध करो, दोषों पर क्रोध करो। निश्चित मर्यादा में क्रोध हो, तो वह क्रोध सही है।
अगर बिना बात ही क्रोध आ जाए तो फिर यह महाविनाश करने वाला होता है। क्रोध अगर नियंत्रण से बाहर हो जाए, आप से बाहर हो जाए, तो इससे बड़ी खतरनाक कोई चीज नहीं हो सकती। जैसे आग अगर मर्यादा में है और आप उससे हाथ ताप रहे हैं, तो ठीक है। अगर मर्यादा से रहित हैं, तो आपको नुकसान पहुंचाएगी।
फ्रांस के लोग कहा करते हैं कि उतनी आग जलाओ, जितनी आग काबू में रख सको। इसका मतलब है कि जितने गुस्से पर काबू पा सको, उतना ही गुस्सा करो। नहीं तो दुनिया आपको काबू में कर लेगी। उसके बाद पछताते रह जाओगे। कहा जाता है कि क्रोध हमेशा मूर्खता से शुरू होता है और पश्चाताप पर खत्म होता है।
जैसे ही क्रोध की पहली चिनगारी आपके अंदर उठे और वह मर्यादा से बाहर जाने की कोशिश करे, तो तभी उस पहली चिनगारी पर नियंत्रण पाने की कोशिश करनी चाहिए। नहीं तो क्रोध जब पूरी फौज लेकर आएगा, तो बहुत मुश्किल हो जाएगी।