किसने कह दिया कि बच्चों को सजा या दंड देकर सुधारा या बदला जा सकता है। वास्तव में उसके अंदर कुछ भी गड़बड़ नहीं है। जीवन अपने शुद्ध रूप में बच्चे के रूप में ही प्रकट होता है। इस समाज में फिट होने के लिए आपने खुद को विकृत किया है, बच्चे ने नहीं। बच्चों का जीवन तो ठीक वैसा ही है, जैसा कि मनुष्य जीवन को होना चाहिए, लेकिन आपको यह पसंद नहीं है।
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दरअसल, असली दिक्कत है कि हमें बच्चों को एक अलग ही दुनिया के लायक बनाना है, इस दुनिया के लायक नहीं। बच्चे तो इस दुनिया के हैं, पर ऐसा लगता है कि आप खुद कहीं बाहर की दुनिया से आए हैं। ऐसा मत सोचिए कि आपको बच्चे को सुधारना है। बच्चे में कुछ ऐसा नहीं है, जिसे सुधार की जरूरत हो।
आप जिस समाज में रह रहे हैं, क्या आप उससे सौ फीसदी खुश हैं? नहीं हैं। लेकिन आप अपने बच्चे को उसके मुताबिक बनाना चाहते हैं, उसे एक भावनाशून्य इंसान बनाना चाहते हैं। जो इस समाज में फिट होगा और उसकी चाकरी करेगा। आपको समझना चाहिए, कि बच्चों को दक्ष या फिर चैंपियन बनाने की कला आसान नहीं है। आपको कुछ भी पता नहीं है। आप बस उन्हें इस दुनिया में गुजर बसर के कुछ दाव पेंच सिखा रहे हैं।
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हो सकता है, वे चीजों को वैसे न करें, जैसे आप चाहते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह और भी अच्छी बात है। इससे दुनिया में बदलाव आएगा। और यह शानदार बात होगी। बच्चों को बस प्रेरणा की जरूरत होती है, इस तरह सुधार की नहीं।