वामन नदी किनारे बसे एक छोटे से गांव में रहता था। वह बहुत मेहनती था। पूरा गांव उसकी तारीफ करता था और सभी को अपेक्षा थी कि वह एक दिन गांव का नाम रोशन करेगा। वामन की इस सफलता के पीछे उसके गुरु जी थे, जिनको वह बहुत मानता था। एक बार वामन ने गुरु जी से पूछा, क्या मैं भी बड़ा आदमी बन पाऊंगा? गुरु जी बोले, मैं तुम्हारे इस सवाल का जवाब तब दूंगा, जब तुम मेरी एक परीक्षा में उत्तीर्ण होओगे।
नदी के तट पर ढेरों पत्थर पड़े रहते हैं। ज्यादातर पत्थर ठंडे होते हैं, पर लाखों में एक पत्थर होता है, जो नदी में होने के बावजूद गर्म होता है। अगर तुम एक भी जीवंत पत्थर मेरे पास ले आओगे, तो मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर जरूर दूंगा। पत्थर की तलाश में एक सप्ताह गुजर गया। गांव के तमाम लोग आश्चर्य में पड़ गए कि गुरु जी ने वामन को कैसी चुनौती दे दी। करीब तीन सप्ताह बीतने के बाद वामन के हाथ में अंततः एक पत्थर आया, जो गर्म था। लेकिन जब तक वामन यह बात समझ पाता कि वह पत्थर गर्म है, तब तक आदत के अनुरूप वह उस पत्थर को नदी में उछाल चुका था। वह गुरु जी के पास गया और उनको उसने सारी घटना सुनाई। गुरु जी हंसने लगे।
वामन ने मायूस होकर गुरु जी से पूछा, क्या आप मेरी अक्षमता पर हंस रहे हैं? गुरु जी मुस्कराए और वामन के सिर पर हाथ फिराते हुए बोले, नहीं वामन। मैं तो बस तुम्हें सफल होने का मार्ग दिखाना चाह रहा था। तुम्हारे सवाल का जवाब आज तुम्हें खुद ही मिल गया। अक्सर हम जिंदगी में छोटी-छोटी सफलताओं, छोटी-छोटी परिस्थितियों के इतने आदि हो जाते हैं कि सफल होने का अवसर कब हमारे हाथ में आया और कैसे झट से निकल गया, यह हमें पता ही नहीं चल पाता। जो व्यक्ति अपने इस क्षण को पूरे होश में जीए, जो हमेशा सजग और प्रफुल्लित रहे, वही अंत में सफलता को प्राप्त करता है। मेहनत आवश्यक जरूर है, लेकिन साथ में उसकी दिशा और उद्देश्य भी अति आवश्यक है।