हनुमान जी महाबलशाली और पराक्रमी माने जाते हैं। संजीवनी बूटी की समझ नहीं होने पर पूरा का पूरा पर्वत उठा लाए। लेकिन जब देवी सीता की खोज में हनुमान जी लंका गए तो उन्होंने अशोक वाटिका में देवी सीता को देखा। देवी सीता कष्ट में समय बिता रही थी।
इसके बावजूद भी हनुमान जी जब लंका से लौटने लगे तो सिर्फ देवी सीता की चूड़ामणि लेकर राम के पास आ गए। भगवान राम को लंका पर आक्रमण करके देवी सीता को अशोक वाटिका से मुक्त कराना पड़ा। जबकि हनुमान जी चाहते तो देवी सीता को साथ लेकर आ सकते थे, फिर हनुमान जी ने ऐसा क्यों नहीं किया?
श्री कृष्ण की तरह हनुमान ने किया यह काम
हनुमान जी सीता को साथ लेकर नहीं आए इसका पहला कारण यह माना जाता है कि हनुमान जी भगवान राम के दूत बनकर गए थे। दूत की मर्यादा यह है कि स्वामी जिस काम से भेजे उस काम से संबंधित सूचना प्राप्त करके स्वामी तक पहुंचाए।
भगवान श्री कृष्ण ने भी ऐसा ही किया था जब युधिष्ठिर के दूत बनकर कुरू सभा में पाण्डवों के लिए पांच गांव मांगने पहुंचे थे। श्री कृष्ण चाहते तो दुर्योधन द्वारा कृष्ण को बंदी बनाने के आदेश पर दुर्योधन का वध कर सकते थे।
लेकिन दूत की मर्यादा का ध्यान रखते हुए ही श्री कृष्ण ने संयम से काम लिया। ठीक इसी प्रकार हनुमान जी ने भी संयम का परिचय दिया था।
इसलिए हनुमान चाहकर भी सीता को साथ नहीं ला पाते
हनुमान जी द्वारा सीता को अपने साथ नहीं लाने का दूसरा कारण यह था कि देवी सीता पतिव्रता स्त्री थी। पतिव्रता स्त्री अपनी मर्जी से अपने पति के अलावा किसी अन्य के साथ कहीं नहीं जा सकती।
हनुमान जी चाहते भी तो सीता उनके साथ नहीं आती। अगर देवी सीता हनुमान जी के साथ चली आती तो यह उनके पतिव्रत धर्म के विरूद्घ होता। यहां सीता और हनुमान दोनों ने ही अपनी-अपनी मर्यादा का परिचय दिया।
भगवान राम के लिए नहीं किया हनुमान ने यह काम
तीसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि अगर हनुमान जी देवी सीता को साथ ले आते तो भगवान राम द्वारा रावण का वध नहीं हो पाता। धरती पर भगवान विष्णु के अवतार राम का महत्व स्थापित करने के लिए यह जरूरी था कि भगवान राम स्वयं लंका पर आक्रमण करें और अधर्म के प्रतीक बन चुके रावण का वध उनके बंधुओं समेत करें।
रावण की अशोक वाटिका से स्वयं सीता को मुक्त करवाकर धर्म और न्याय की स्थापन करने से राम का प्रभुतत्व जनमानस में उजागर होता। यही कारण है कि हनुमान जी स्वयं सीता को साथ लेकर नहीं आए।