प्रायः वैराग्य का अर्थ है घर-बार छोड़कर, उदास होकर गंगा किनारे बैठ जाओ। इसीलिए लोग कहते हैं कि ‘हम तो गृहस्थ हैं, अतः हम वैराग्य कैसे करें?’ पर वास्तव में वैराग्य का यह अर्थ नहीं है।
घर-बार छोड़कर हरिद्वार जाकर बैठ जाने का नाम वैराग्य नहीं है। संसार को असार जानना, देह को मिट्टी समझना, यह वैराग्य है। अगर आपको यह बात समझ लग गई कि तुम्हारा यह देह मिट्टी है, जिस संसार को तुम देख रहे हो यह सदा नहीं रहेगा, तो यही वैराग्य है।
पहले इस वैराग्य को पक्का करो फिर बड़े मजे़ से घर में रहो, जीवन के सारे काम करो। संसार में रहने से वैराग्य ख़त्म नहीं होता और संसार छोड़ देने से मन राग से छूट जाएगा, यह बात भी झूठ है। जिसे राग करने की आदत हो, वह जहां जाएगा वहीं राग करने लगेगा।
अगर कोई परिवार, बंधु सब छोड़कर कहीं चला जाए, तो कहां जाएगा। हां किसी का दिवाला निकल जाए, तो पैसा न होने पर घबराहट के कारण भाग सकता है। घर किसी भी वजह से छोड़ा जा सकता है। यह वैराग्य का मार्ग नहीं।
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देखिए, घर छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं है। जिसके मन में आसक्ति है, वह अगर घर छोड़कर हरिद्वार, ऋषिकेश कहीं चला भी जाए तो वहां उस आश्रम में जाकर राग बना लेगा कि ‘ये कमरा मेरा है’। अगर भगवा कपड़ा पहन कर मन ही मन सोचता है कि कब गुरुजी मरें और मैं गद्दी पर बैठूं तो इसमें वैराग्य कहां दिखता है।
एक बार मुझे एक महात्मा मिले। कहने लगे, गुरुमाँ! मेरी बहुत इच्छा है कि मैं तपोवन में जिस गुफा में रह रहा था, वहां आपको लेकर चलूं। मैंने कहा कि हमारी भी बहुत इच्छा है वहां जाने की। उन्होंने बताया कि वह वहां लगभग 22 साल रहे हैं। अब पता नहीं वहाँ कौन रह रहा है, अगर वह खाली हुई तो मैं वहां रात्रि में विश्राम कर सकती हूं। मैंने पूछा आप इतने समय वहां रहे तो फिर उसे छोड़कर क्यों आ गए। कहने लगे कि गुफा खाली मिली थी, खाली छोड़ आए।
गुफा किसी की सम्पत्ति नहीं है। वैराग्य का अर्थ सिर्फ इतना है कि यह संसार न सदा था, न सदा रहेगा, वैराग्य के बिना तुम संत साधु नहीं हो सकते। वास्तव में संत कौन है? अगर कोई सच्चे मन से साधना को अपने जीवन में ला रहा हो, जिसने सत्य का अनुसंधान कर लिया हो, संत-महात्मा वही है।