गोवर्धनलीला के संदर्भ में श्रीकृष्ण की मूलचिंता थी ईश्वर के नाम पर मानवता का शोषण। ब्रज का तत्कालीन समाज तब जल और कृषि में समृद्धि के लिए इंद्र की पूजा करता था। पूजा के नाम पर तब पाखंड रचा जाता।
श्रीकृष्ण ने ब्रजवासी जनों से कहा कि वे मुख्यतः ग्राम/वनों में निवास और विचरण करते हैं। अतः उन्हें अपने पर्यावरण का ही पूजन करना चाहिए। यह भी बताया कि वर्षा का जल इंद्र से न आकर वृक्ष, पर्वतों की कृपा से उपलब्ध होता है।
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ब्रजवासियों ने पर्यावरण के देवता श्री गोवर्धन को सम्मानित का उत्सव प्रारंभ किया। इस उत्सव का एक और गहरा महत्व है। श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं के द्वारा भक्ति अर्थात् सेवा को ही प्रमुख साधन स्वीकार किया। अतः उनका यह संकल्प था कि आध्यात्म जगत में भी भक्त की प्रतिष्ठा सर्वोपरि होनी चाहिए।
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श्रीकृष्ण की परम उपासिक ब्रज गोपिकागण गोवर्धन महाराज को ही श्रीकृष्ण का सर्वश्रेष्ठ भक्त कहकर संबोधित करते हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा कि ‘मैं भक्तन को दास, भगत मेरे मुकुटमणि’। अतः दीपावली के दूसरे दिन इंद्र के स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों के द्वारा भक्त शिरोमणि गोवर्धन महाराज का विधिवत् पूजन अर्चन कराया।
इतना ही नहीं पूजन के समय गोवर्धन की प्रत्येक पावन शिला में ब्रजवासियों को श्रीकृष्ण के मुखारबिंद के ही दर्शन हुए। इसका तात्पर्य है कि गोवर्धन पूजन भक्त और भगवान के पूर्ण एकाकार और तादाद में होने का उत्सव है।