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जहां प्रेम है, वहां परमात्मा हैः दाती जी महाराज

Mon, 29 Apr 2013 12:27 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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मनुष्य रूप में जन्म लेकर यदि तुम्हारे वश का कुछ नहीं है तो प्रेम का रास्ता अपना सकते हो। क्योंकि प्रेम से ही ध्यान, योग, साधना इत्यादि संभव हो सकता है, जो परमात्मा से जुडऩे का सबसे सरल उपाय है। स्वभाव से सरल हो जाओ। मन में मत पैदा होने दो कुंठाएं। जैसे तुम अपने आप को प्रेम करते हो, वैसे ही प्रेम परमात्मा से भी करो । परमात्मा को अपना ही अंश समझो। प्रेम से ही भक्ति होती है। क्योंकि प्रेम में पूर्ण समर्पण की भावना होती है, उसमें स्वार्थ नहीं होता।
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जहां प्रेम होता है, वहां त्याग की भावना होती है। जहां अहंकार होता है, वहां प्रेम की भावना नहीं होती। प्रेम में लोभ की भावना नहीं होती। जिसके अंदर प्रेम का भाव है, वही भक्ति कर सकता है। प्रेम से, परमात्मा से, जुडऩा ही भक्ति है। परमात्मा को पाने का सबसे सरल उपाय प्रेम पूर्वक समर्पित हो सच्चे भक्त बन जाओ।

प्रत्येक घटना को परमात्मा की इच्छा मान स्वीकारते जाओ। उसे परमात्मा की मर्जी समझ स्वीकारते जाओ। स्वीकार करने का भाव अपने अंदर ले आओ। परमात्मा जैसा चाहता है उसे स्वीकार करना सीखो, मत करो विवाद, मत करो शिकायत, मत करो क्रोध, मत हो नाराज।
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परमात्मा से आत्मा का जुड़ाव न होने के कारण मनुष्य के अंदर स्थित आत्मा अचेत हो गई है और मन आत्मा पर हावी हो गया है। मन में कई तरह के विकार आ गये हैं, जिससे चेतन शक्ति क्षीण हो गई है। अचेत पड़ी आत्मा को सचेत करना होगा। क्योंकि आत्मा तो परमात्मा का अंश है। आत्मा को सचेत करने के लिए परमात्मा से जुडऩे का प्रयास करना होगा।

हमें अपने अंदर परमात्मा के गुणों को विकसित करना होगा। इसके लिए सदाचारी बनो, अपने अंदर सद्भाव लाओ। अपने दिल से नफरत को निकाल दो और संसार में प्रेम की ज्योति जला दो। बिना जप तप किये, परमात्मा को पाने का सबसे सरल उपाय है कि परमात्मा से प्रेम करो। प्रभु के भक्त हो जाओ। जैसे तुम अपने आपसे जुड़े हो वैसे ही परमात्मा से जुड़ जाओ।

परमात्मा का भजन ही तुम्हें इस संसार से पार उतारेगा। परमात्मा का सुमिरन ही तारेगा। दो अक्षर प्रभु के नाम का प्रेम से स्मरण करने से ही परमात्मा का दर्शन संभव है। क्रोध की लाल आंखें कुछ न कर सकेगी। मोह-लोभ से भरे तुम्हारे कर्म व्यर्थ हो जाएंगे। मन में द्वेष के विचार पतन की ओर ले जाएंगे। तुम्हारे प्रेम भरे वचन स्वर्ग की ओर मोड़ देंगे। तुम्हें बताना, समझाना, मेरा कर्तव्य है, मेरे बताए हुए को समझना तुम्हारा कर्तव्य है।

मैंने प्रभु से जुड़ने की युक्ति बताकर अपने दायित्व को पूरा किया है। उस युक्ति को समझकर उसे अमल में लाते हुए तुम अपने दायित्व को पूरा करो। यह जीवन कर्म करने के लिए मिला है। जिनको अपने जीवन से प्रेम है, वे कर्म कर रहे हैं। बिना प्रेम के कुछ भी संभव नहीं होता। परमात्मा का नाम ही प्रेम है। इसलिए जहां प्रेम है, वहां परमात्मा है।
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